थाना बना मौत का गलियारा: एएसआई प्रमोद पवन ने की आत्महत्या, वायरल वीडियो में लगाए पुलिस अधिकारियों और रेत माफियाओं पर गंभीर आरोप
थाना प्रभारी, आरक्षक और रेत माफिया पर प्रताड़ना व जान से मारने की धमकी का आरोप, पुलिस महकमा घिरा सवालों में
विंध्य वसुंधरा समाचार दतिया (म.प्र.)।
मध्यप्रदेश के दतिया जिले से मंगलवार को एक ऐसी दर्दनाक और खौफनाक घटना सामने आई है, जिसने न केवल पुलिस विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह संदेह और शर्मिंदगी का विषय बन गया है कि क्या अब पुलिस थाना परिसर भी खुद पुलिसकर्मियों के लिए असुरक्षित हो गए हैं?
गोदन थाने में पदस्थ सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) प्रमोद पवन (55 वर्ष) ने थाना परिसर में बने सरकारी आवास में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मौत से पहले उन्होंने एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में उन्होंने थाना प्रभारी अरविंद सिंह भदौरिया, एक अन्य थाना प्रभारी, एक आरक्षक और कथित रेत माफियाओं पर संगीन आरोप लगाते हुए कहा है कि अगर उन्हें कुछ हो जाए, तो इसके जिम्मेदार यही लोग होंगे।
"15 दिन से थाने में बंद हूं... बाहर जाने नहीं दे रहे" — आत्मघाती वीडियो में खुलासा
मृतक एएसआई प्रमोद पवन ने अपने वीडियो में कहा है कि उन्होंने कुछ समय पहले रेत माफिया के एक ट्रैक्टर को पकड़ा था, जिसके बाद से उन्हें लगातार मानसिक यातनाएं दी जा रही थीं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें 15 दिनों से थाने से बाहर जाने नहीं दिया जा रहा था और जान से मारने की धमकियां भी मिल रही थीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रेत माफियाओं की मिलीभगत से पुलिस अधिकारी उन्हें प्रताड़ित कर रहे थे।
वीडियो में उनका स्वर थरथराता है, चेहरा भय से व्याकुल है और यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वे किस मानसिक स्थिति में थे। उन्होंने साफ कहा— “मैं अब और नहीं झेल सकता... मैं आत्महत्या कर रहा हूं... मेरी मौत के जिम्मेदार ये चार लोग होंगे।”
पुलिस ने किया आरोपों से इनकार, लेकिन महकमा सवालों के घेरे में
थाना प्रभारी अरविंद भदौरिया ने एएसआई द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को "मनगढ़ंत और झूठा" बताया है। मगर सवाल यह है कि अगर आरोप निराधार थे, तो एक अनुशासित पुलिसकर्मी आत्महत्या जैसे कठोर कदम पर क्यों पहुंचा? और वह भी थाना परिसर के भीतर, जहां सुरक्षा और अनुशासन का दावा सबसे अधिक किया जाता है?
यह मामला केवल एक आत्महत्या का नहीं है, बल्कि प्रदेश की पुलिस व्यवस्था की अंतर्विरोधी परतों को उजागर करने वाला प्रमाण है। क्या पुलिस महकमे के अंदरुनी हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि एक ईमानदार अधिकारी को अपनी बात कहने का भी मंच नहीं मिलता?
क्या माफिया-पुलिस गठजोड़ की शिकार हुई वर्दी?
दतिया, मुरैना, भिंड जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से रेत माफियाओं के सक्रिय रहने की खबरें आती रही हैं। प्रशासन द्वारा समय-समय पर कार्रवाई का दावा किया जाता है, लेकिन सच्चाई क्या है, यह इस घटना ने उजागर कर दिया है। अगर एक एएसआई, जो खुद कानून व्यवस्था का अंग है, माफिया और अफसरों की प्रताड़ना से इस कदर टूट जाए कि आत्महत्या कर ले — तो आम जनता की सुरक्षा की कल्पना ही भयावह हो जाती है।
विंध्य वसुंधरा समाचार की टिप्पणी: गोपनीय जांच से खुल सकते हैं कई काले सच
विंध्य वसुंधरा समाचार इस विषय पर पूर्व में भी कई बार प्रशासन को चेताता रहा है कि विभागों में पदस्थ कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की निष्क्रियता, ढिलाई और मिलीभगत, संवेदनशील मामलों में कार्रवाई की राह में बाधा बन रही है। यदि प्रशासनिक स्तर पर गोपनीय और निष्पक्ष जांच समय पर कराई जाती, तो शायद ऐसी आत्मघाती घटनाओं को टाला जा सकता था।
यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था पर गहराते अविश्वास का स्पष्ट संकेत है। रेत माफिया, ड्रग माफिया, अवैध शराब कारोबारी — इन सबके खिलाफ लोकायुक्त की छिटपुट कार्रवाई यह संकेत देती है कि प्रदेश का कोई विभाग अब भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रह गया है।
सरकार को यह समझना होगा कि जब तक ईमानदार अधिकारियों की रक्षा और भ्रष्टाचारियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी त्रासदियां दोहराई जाती रहेंगी। ऐसे संवेदनशील मामलों में गोपनीय छापामार जांच करवाई जाए, तो इस गड़बड़झाले में राजनेता, अफसर और कुछ कथित पत्रकारों तक के नाम उजागर हो सकते हैं, जो माफियाओं से लाभ लेकर व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं।
न्याय और साख की कसौटी पर पुलिस तंत्र
अब यह देखना शेष है कि सरकार इस मामले में सिर्फ औपचारिक जांच कर खानापूर्ति करती है या दोषियों को कानून के कठघरे तक लाकर व्यवस्था में विश्वास पुनः स्थापित करने का साहसिक निर्णय लेती है।

