गढ़ में तथा कथित पत्रकारों का दुस्साहस: प्रेस लिखे वाहन से क्लीनिक पहुंच कर की जबरन वसूली की कोशिश, पुलिस व बीएमओ के नाम से दी धमकी, वीडियो वायरल
विंध्य वसुंधरा समाचार की विशेष रिपोर्ट
रीवा जिले में पत्रकारिता की गरिमा को कलंकित करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत गढ़ थाना गढ़ अंतर्गत एक निजी क्लीनिक में चार संदिग्ध व्यक्तियों द्वारा स्वयं को पत्रकार बताकर अवैध वसूली करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में दिख रहे तथाकथित पत्रकारों ने पुलिस और बीएमओ (ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर) के नाम पर क्लीनिक संचालक को डरा-धमकाकर जबरन पैसे मांगने का प्रयास किया।
चार पहिया वाहन से पहुंचे इन लोगों ने गाड़ी के पीछे ‘PRESS’ लिखवा रखा था और क्लीनिक में घुसते ही दस्तावेज जांच, पंजीयन की वैधता और कार्रवाई की धमकी देते हुए खुद को प्रभावशाली पत्रकार बताया। लेकिन जब स्थानीय लोगों को इस हरकत की भनक लगी तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर इन कथित पत्रकारों की गतिविधियों को कैमरे में कैद कर लिया और सच्चाई को उजागर कर दिया।
स्थानीय जनों की सजगता से टली बड़ी घटना, फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगीं
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यदि स्थानीय नागरिक समय पर मौके पर नहीं पहुंचते, तो यह गिरोह क्लीनिक संचालक से मनचाही रकम वसूल कर चलता बनता। घटना का वीडियो सामने आने के बाद गढ़ और आसपास के क्षेत्रों में पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
गढ़ क्षेत्र बना तथा कथित पत्रकारों की गतिविधियों का गढ़
गढ़ क्षेत्र से इस तरह की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं। कभी होटल, कभी दुकान, तो कभी क्लीनिक – प्रेस के नाम पर कई बार जबरन वसूली और ब्लैकमेलिंग की शिकायतें हो चुकी हैं। लेकिन हर बार प्रशासन की निष्क्रियता इन फर्जी पत्रकारों का हौसला बढ़ाती रही है। यह चिंतनीय है कि अब तक इन घटनाओं में कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
प्रेस की आड़ में अपराध, संरक्षण देने वालों की भी हो जांच
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इन तथाकथित पत्रकारों को किसका संरक्षण प्राप्त है? किसके भरोसे ये लोग प्रेस लिखे वाहन लेकर खुलेआम घूम रहे हैं, और पुलिस-प्रशासन का नाम लेकर डराने में सफल हो रहे हैं? क्या ऐसे लोगों को जानबूझकर राजनीतिक या प्रशासनिक छाया में पनपने दिया जा रहा है?
प्रशासन और पत्रकार संगठनों को कठोर कदम उठाना होगा
विंध्य वसुंधरा समाचार स्पष्ट करता है कि वह वायरल हुए वीडियो की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता, लेकिन जो दृश्य सामने आए हैं वे अत्यंत गंभीर और चिंता जनक हैं। पत्रकारिता एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनशील एवं जिम्मेदार इकाई है। यदि कोई व्यक्ति या समूह इसका दुरुपयोग करता है, तो यह न केवल पीड़ित व्यक्ति के साथ अन्याय है, बल्कि पूरे पत्रकार समाज की प्रतिष्ठा पर सीधा आघात है।
अतः हमारी प्रशासन से यह मांग है कि:
1. वायरल वीडियो की निष्पक्ष व कठोरता से जांच कराई जाए,
2. फर्जी पत्रकारों की पहचान कर उनके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं,
3. ‘प्रेस’ लिखे वाहनों की पंजीयन एवं प्रेस संबंधी वैधता की सघन जांच की जाए,
4. और जिन अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण यह गिरोह फल-फूल रहा है, उनकी भी जवाबदेही तय की जाए।
यदि अब भी नहीं जागा प्रशासन, तो यह मौन स्वीकृति मानी जाएगी
यदि प्रशासन इस घटना पर भी केवल वीडियो को “असत्यापित” कहकर खारिज करता रहा, और दोषियों को दंडित नहीं किया गया, तो यह मानना पड़ेगा कि कहीं न कहीं प्रशासनिक ढाँचे में ही ऐसी आपराधिक मानसिकता के लोगों को संरक्षण मिल रहा है। इससे आम जनता में न्याय व्यवस्था और पत्रकारिता – दोनों के प्रति अविश्वास पनपने का खतरा है।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है – लेकिन यदि वह स्वयं ही भ्रष्टाचार और डराने-धमकाने का औजार बन जाए, तो लोकतंत्र का संपूर्ण ढाँचा डगमगाने लगता है। अब वक्त आ गया है कि प्रशासन, पुलिस, और पत्रकार संगठन मिलकर ऐसे तत्वों को चिन्हित करें, कार्रवाई करें और समाज को यह भरोसा दिलाएं कि फर्जीवाड़े के लिए प्रेस का चोला ढाल नहीं बनेगा।




