जन्म-जन्मांतर के सत्कर्मों और सुसंस्कारों से मिलती है भागवत भक्ति कैथा महायज्ञ का पांचवां दिन – अजामिल उद्धार कथा और समुद्र मंथन का वैज्ञानिक विवेचन
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा, 16 अगस्त 2025।
रीवा जिले के कैथा स्थित हनुमानजी स्वामी मंदिर प्रांगण में चल रहे भागवत महापुराण महायज्ञ के पांचवें दिवस का आयोजन आध्यात्मिक उल्लास और श्रद्धा की गूंज के बीच सम्पन्न हुआ। 12 अगस्त से प्रारंभ यह पुण्य-उत्सव आगामी 18 अगस्त को पूर्णाहुति, हवन और विशाल भंडारे के साथ संपन्न होगा। इस बीच प्रतिदिन आचार्य डॉ. गौरीशंकर शुक्ला के ओजस्वी प्रवचनों से श्रद्धालु अध्यात्म, धर्म और जीवन दर्शन का अमृतरस ग्रहण कर रहे हैं।
अजामिल की कथा – पाप से पतन और प्रभु स्मरण से उद्धार
डॉ. शुक्ला ने पांचवें दिन अजामिल प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि जन्म से ब्राह्मण अजामिल कुसंगति के कारण पतित हो गया। यद्यपि उसके जीवन में पाप और पतन का अंधकार छा गया, किंतु पूर्व जन्मों के सत्कर्म और संस्कार अंततः उसके उद्धार का कारण बने।
अंत समय में अपने पुत्र “नारायण” का नाम पुकारते ही उसका उद्धार हो गया और यमदूत भी उसे छू न सके। कथा ने स्पष्ट संदेश दिया कि ईश्वर का स्मरण अंतिम क्षण में भी जीवन की दिशा बदल सकता है।
गीता का प्रतिपादन : आत्मा अमर है, शरीर नश्वर
प्रवचन में श्लोक उद्धृत करते हुए आचार्य ने बताया –
“आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह नित्य, शाश्वत और अविनाशी है।”
उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह शरीर नहीं बल्कि आत्मा है। शरीर नष्ट होता है, परंतु आत्मा अमर रहती है। इस सत्य को समझकर ही जीवन का वास्तविक उत्थान संभव है।
संस्कार और कर्म का अनिवार्य फल
अजामिल प्रसंग से यह भी स्पष्ट हुआ कि मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके पूर्व जन्म के संस्कारों और कर्मों का प्रतिफल है। अजामिल का पुत्र का नाम “नारायण” रखना और अंतिम समय में उसी नाम का स्मरण करना उसके पूर्वजन्म के शुभ कर्मों की ही परिणति थी।
यही सिद्धांत भागवत महापुराण और गीता दोनों में प्रतिपादित है कि जिस भाव में मनुष्य अंत समय में होता है, वही उसका भविष्य जन्म निर्धारित करता है।
कुसंगति से पतन, सत्संगति से उत्थान
प्रवचन में यह भी कहा गया कि कुसंगति मनुष्य को अधर्म और पाप की ओर धकेल देती है, वहीं संतों और सत्पुरुषों की संगति जीवन को प्रकाशमय बना देती है। अजामिल का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है।
प्रभु नाम का स्मरण – मुक्ति का सर्वोत्तम साधन
डॉ. शुक्ला ने बताया कि प्रभु नाम की महिमा अपरंपार है। यह केवल साधना का साधन नहीं बल्कि मोक्ष का मार्ग है। मनुष्य चाहे कितना भी पतित क्यों न हो, यदि वह ईश्वर का नाम सच्चे भाव से ले तो उसका उद्धार निश्चित है।
समुद्र मंथन का आध्यात्मिक-वैज्ञानिक विवेचन
पांचवें दिन के प्रवचन में समुद्र मंथन प्रसंग का भी उल्लेख हुआ। आचार्य ने बताया कि देव और असुरों का यह संग्राम केवल धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि इसमें गहन वैज्ञानिक और दार्शनिक संदेश निहित हैं।
मंथन से विष का निकलना जीवन की कठिनाइयों का प्रतीक है।
अमृत प्राप्ति यह दर्शाती है कि कठिन परिश्रम और सहयोग से ही जीवन में श्रेष्ठ उपलब्धियां मिलती हैं।
देव और दानव मिलकर मंथन करते हैं, जो यह बताता है कि विरोधी शक्तियां भी संतुलन बनाकर सकारात्मक परिणाम ला सकती हैं।
भागवत का सार्वभौमिक संदेश
आचार्य ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि यह जीवन-प्रबंधन और आत्मोन्नति का कालजयी ग्रंथ है। इसमें वर्णित शिक्षाएं आज के कलियुग में उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी हजारों वर्ष पूर्व थीं।
कलियुग में उद्धार का सरल मार्ग
प्रवचन में यह भी बताया गया कि भागवत महापुराण का अवतरण कलियुग के पतित प्राणियों के उद्धार के लिए हुआ है। केवल नाम-स्मरण, सत्संग और भक्ति से जीवन का उत्थान संभव है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
कैथा यज्ञस्थली में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित होकर भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं। भक्तिमय वातावरण में भजन, कीर्तन और प्रवचन की रसधारा बह रही है। श्रद्धालु भावविभोर होकर ईश्वर-स्मरण में लीन हो रहे हैं।
18 अगस्त को होगा भव्य समापन
कार्यक्रम का समापन 18 अगस्त को पूर्णाहुति, हवन और विशाल भंडारे के साथ किया जाएगा। आयोजकों ने बताया कि इस दिन हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।





