Breaking// योग और ईश्वर प्राणिधान से मनुष्य पाता है मन व इन्द्रियों पर नियंत्रण – डॉ. गौरीशंकर शुक्ला
विंध्य की तपोभूमि रीवा के कैथा स्थित हनुमानजी स्वामी मंदिर प्रांगण में जारी श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ-2025 में श्रद्धा और भक्ति का अनुपम संगम देखने को मिल रहा है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु धर्म, अध्यात्म और वेदांत की अमृतवर्षा का श्रवण कर जीवनोपयोगी शिक्षाएँ प्राप्त कर रहे हैं। इस अवसर पर प्रख्यात वेदांताचार्य एवं विद्वान डॉ. गौरीशंकर शुक्ला ने अपने प्रवचन में बताया कि योग साधना और ईश्वर प्राणिधान ही वह आधार हैं, जिनसे मनुष्य अपने चंचल मन और उच्छृंखल इन्द्रियों पर नियंत्रण पा सकता है।
अजामिल कथा – नियंत्रण खोने का परिणाम
डॉ. शुक्ला ने अजामिल प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य की दृष्टि और विचार उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। अजामिल ने अपने नेत्र और मन पर संयम न रखकर विषय-वासना की ओर दृष्टि डाली और वही उसका पतन का कारण बना। उन्होंने कहा –
“मनुष्य जो कुछ देखता, सुनता और सोचता है, वही उसके मन और बुद्धि में अंकित होता है। यदि वह ईश्वर का नाम स्मरण कर अपने नेत्र और विचारों को पवित्र रखे तो उसका जीवन उज्ज्वल और संतुलित बन सकता है।”
योग और वेदांत – मनोविज्ञान का शाश्वत समाधान
प्रवचन में उन्होंने बताया कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व ही मन और इन्द्रियों के विज्ञान को समझकर योग दर्शन की स्थापना की। पतंजलि योगसूत्र में अष्टांग योग के माध्यम से साधक को इन्द्रियों पर विजय पाने और मन को साधने की विधियाँ विस्तार से दी गई हैं। उन्होंने कहा –
“योग केवल आसनों का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह मन, बुद्धि और आत्मा का शुद्धिकरण है। ईश्वर प्राणिधान, ध्यान और समाधि के द्वारा साधक क्रमशः इन्द्रियों के आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मिक शांति तथा परम मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।”
भगवान के नाम का महत्व – कलियुग की सर्वोच्च साधना
डॉ. शुक्ला ने भागवत और गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान का नाम स्मरण ही कलियुग में मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। उन्होंने बताया कि मृत्यु के समय जिस भाव में मनुष्य रहता है, वही उसकी अगली योनि या गति का कारण बनता है।
“यदि साधक जीवनभर प्रभु के नाम का स्मरण करता रहे, तो अंत समय में भी उसका मन उसी भाव में स्थिर रहेगा और अंततः वह भगवान की प्राप्ति कर लेगा। यही कारण है कि संत-मनीषियों ने नामजप को कलियुग में समस्त यज्ञ और तप का फल माना है।”
18 अगस्त को होगा हवन एवं भव्य भंडारा
कैथा की पवित्र धरती पर चल रहा यह पापविनाशक, मोक्षप्रदायक एवं जीवनदायी महायज्ञ 18 अगस्त 2025 को पूर्णाहुति, विशाल हवन और भव्य भंडारे के साथ संपन्न होगा। आयोजक मंडल ने सभी श्रद्धालुओं से इस अद्वितीय आध्यात्मिक अवसर का लाभ लेने का आग्रह किया है।



