कैथा में श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिवस सम्पन्न मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का चरित्र अनुकरणीय – डॉ. गौरीशंकर शुक्ला
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा/मऊगंज , 17 अगस्त 2025।
पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित हनुमान जी स्वामी मंदिर प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत भक्ति-ज्ञान महायज्ञ का छठा दिवस भक्तिरस और आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ। व्यासपीठ पर विराजमान कथा आचार्य डॉ. गौरीशंकर शुक्ला ने आज के प्रवचन में भगवान श्रीराम, भगवान परशुराम और भगवान श्रीकृष्ण के चरित्रों का गहन विवेचन करते हुए उन्हें भारतीय संस्कृति के शाश्वत आदर्श बताया।
श्रीराम और श्रीकृष्ण : मर्यादा और लीला का संगम
कथा व्यास ने कहा कि श्रीनारायण के 24 अवतारों में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण का स्थान सर्वोपरि है।
भगवान श्रीराम का जन्म दोपहर 12 बजे त्रेतायुग में हुआ और उनका चरित्र सरल, मर्यादित और अनुकरणीय है।
भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण अर्धरात्रि में द्वापरयुग में हुआ, जिनकी लीलाएँ गूढ़, रहस्यमय और बहुआयामी रही हैं।
उन्होंने कहा कि जहाँ भगवान श्रीराम धर्म, सत्य और आदर्शों की मर्यादा के प्रतीक हैं, वहीं श्रीकृष्ण मानव जीवन की विविध लीलाओं के माध्यम से धर्म की स्थापना करने वाले लीला पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
भारतीय संस्कृति का आधार और आधुनिक चुनौतियाँ
डॉ. शुक्ला ने अपने उद्बोधन में बताया कि श्रीराम, शिव और श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि आज की आधुनिक पीढ़ी नामकरण की प्राचीन परंपरा से विमुख हो रही है। पहले बच्चे का नाम देवपुरुषों और नारीशक्ति (सीता, राधा, पार्वती, दुर्गा आदि) के नाम पर रखा जाता था ताकि बालक-बालिकाओं के जीवन में आदर्श स्वतः संचारित हो। परंतु आज पश्चिमी सभ्यता के नामों की ओर झुकाव बढ़ता जा रहा है, जो हमारी संस्कृति के क्षरण का संकेत है।
उन्होंने चेताया कि यदि यह प्रवृत्ति बढ़ी तो आने वाले समय में लोग अपने वास्तविक आदर्शों को भूलकर उन्हें कल्पनिक चरित्र या विदेशी सभ्यता के प्रतीक मान बैठेंगे।
शास्त्रों की वैज्ञानिक व्याख्या की आवश्यकता
कथा व्यास ने कहा कि हमारे धर्मग्रंथों को अंधविश्वास या केवल कथा-श्रवण तक सीमित न रखकर उनकी वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण व्याख्या करनी होगी।
उन्होंने स्पष्ट किया—
“यदि भागवत और अन्य शास्त्रों की शिक्षाओं को अक्षरसः ग्रहण किया गया तो यह आधुनिक पीढ़ी में संदेह उत्पन्न करेगा। आवश्यक है कि हम इन ग्रंथों को समयानुकूल दृष्टिकोण से देखें और उनमें निहित वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक सत्य को समझें।”
नवम स्कंध और अवतार कथाएँ
छठे दिन कथा के दौरान श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कंध का वर्णन किया गया।
इसमें भगवान श्रीराम के त्रेतायुगीन अवतरण और उनके मर्यादा-मूलक जीवन का वर्णन आया।
साथ ही भगवान परशुराम के आविर्भाव और उनकी लीला का प्रसंग भी सुनाया गया।
तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण के द्वापरयुगीन अवतार का उल्लेख कर यह बताया गया कि कैसे समय के क्रम में धर्म की स्थिति बदलती रही—त्रेता में मर्यादा, द्वापर में लीला और कलियुग में अधर्म का प्रबल होना।
वैदिक सिद्धांत और आधुनिक विज्ञान का मेल
डॉ. शुक्ला ने ऋग्वेद की नासदीय सूक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि सृष्टि की उत्पत्ति का जो वैज्ञानिक विवरण वेदों में है, वही आधुनिक विज्ञान के बिग-बैंग और ब्लैक होल सिद्धांत से सामंजस्य रखता है।
उन्होंने कहा कि यही कारण है कि हमारी सनातन संस्कृति अन्य संस्कृतियों को आत्मसात कर स्वयं को और भी प्रगाढ़ बनाती है।
✨ कथा स्थल पर दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु भक्ति और ज्ञान से सराबोर होकर धर्ममय वातावरण में डूबे रहे।




