रीवा केंद्रीय जेल में अपराधियों से अधिक नशा तस्करों की भरमार राजनीतिक संरक्षण और विभागीय मिलीभगत ने बिगड़ा रीवा संभाग का संतुलन
क्या रीवा संभाग 'नशे का पंजाब' बनने की राह पर है?
रीवा, 03 अगस्त | विशेष पड़ताल — विंध्य वसुंधरा समाचार
रीवा की केंद्रीय जेल आज प्रदेश की कानून व्यवस्था की एक चुप्पी साधे परिभाषा बन गई है — जहाँ लूट, हत्या, बलात्कार जैसे अपराधों में बंद आरोपी जितने नहीं, उससे कहीं ज्यादा नशीली कफ सिरप, ब्राउन शुगर, गोलियों और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी में गिरफ्तार लोग बंद हैं। यह दृश्य केवल एक जेल का नहीं, बल्कि रीवा रेंज और मध्यप्रदेश के नशे में डूबते भविष्य का भयानक संकेत है।
मध्यप्रदेश आज वह राज्य बन गया है, जो विकास की दौड़ में भले ही पंजाब से पीछे रहा हो, मगर नशे के फैलाव, सेवन, तस्करी और व्यापार में उसकी बराबरी करता दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार पंजाब में नशा एक सामाजिक त्रासदी बन गया, वैसी ही स्थिति की नींव रीवा सहित प्रदेश के कई जिलों में पड़ चुकी है।
रीवा की जेल: अपराधियों का नहीं, अब नशे के कारोबारियों का ठिकाना!
सूत्रों के अनुसार, रीवा केंद्रीय जेल में वर्तमान समय में जितने अपराधी विभिन्न संगीन मामलों में बंद हैं, उससे कहीं अधिक संख्या उन आरोपियों की है, जिन्हें नशीली कफ सिरप, प्रतिबंधित गोलियों, ब्राउन शुगर, गांजा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी, संग्रहण या वितरण के आरोप में पकड़ा गया है।
कई बार तो जेलों में नशा तस्करी से संबंधित वार्डों में जगह तक नहीं बचती — यह आंकड़ा किसी एक दिन का नहीं, लगातार बढ़ती स्थिति का दर्पण है।
कार्यवाही होती है, मगर क्यों बनती है चर्चा का विषय?
रीवा और मऊगंज जिले में जब भी किसी थाना क्षेत्र में नशे के खिलाफ कार्यवाही होती है, वह स्थानीय और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन जाती है। यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
क्या प्रशासनिक कार्रवाई में कोई रुकावट है?
क्या थानों को ऊपर से निर्देश नहीं मिलते या फिर कहीं कोई 'मौन समर्थन' इस व्यापार को फलने-फूलने दे रहा है?
हाल ही में रायपुर कर्चुलियान और मनगवां थाने की कार्यवाही को लेकर जो चर्चाएं तैर रही हैं, वे इसी गहराते अविश्वास की ओर इशारा करती हैं।
हालांकि विंध्य वसुंधरा समाचार इन चर्चाओं की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह ज़रूर मानता है कि मामला अत्यंत गंभीर है — और केवल निष्पक्ष जांच के बाद ही सच सामने आ सकता है।
आबकारी, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग की ‘त्रयी’ बना रही त्रासदी
जांच और पड़ताल में यह स्पष्ट होता है कि नशे के इस संगठित व्यापार में तीन विभागों की भूमिका सबसे ज़्यादा संदिग्ध और चिंताजनक है।
नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय नशा कारोबारी ने बताया कि पुलिस की "मासिक वसूली" प्रणाली के तहत उन्हें प्रति गाड़ी 5 से 6 लाख रुपये तक देने होते हैं।
जो यह रकम नहीं चुका पाते — वे कार्रवाई का शिकार बनते हैं, जिससे मीडिया और आम जनता में "सख्ती" का भ्रम बनाया जा सके।
दिखावटी कार्रवाइयाँ, जबकि अंदर ही अंदर सड़ चुका है सिस्टम
रीवा रेंज के आईजी श्री गौरव सिंह राजपूत ने पदभार ग्रहण करते ही नशा कारोबार के खिलाफ मोर्चा खोलने की पहल की। कई थानों में छापे और गिरफ्तारियाँ हुईं।
लेकिन जानकारों का कहना है कि ये सभी कार्यवाहियाँ सतही हैं — जिनमें केवल छोटे-मोटे डीलर, गिनी-चुनी शीशियाँ या कुछ पेटियाँ पकड़ में आती हैं,
जबकि असली मास्टरमाइंड, थोक व्यापारी और बड़े नेटवर्क ऑपरेटर आज भी पर्दे के पीछे बेखौफ घूम रहे हैं।
राजनीतिक संरक्षण: लोकसभा और विधानसभा में क्यों नहीं गूंजती 'नशे' की आवाज़?
रीवा जिले से विधायक और सांसद दोनों चुने जाते हैं, लेकिन संसद और विधानसभा में आज तक इस संवेदनशील विषय पर कोई ठोस बहस या प्रस्ताव नहीं देखा गया।
यह प्रश्न उठना लाज़मी है — क्या राजनीतिक संरक्षण के कारण ही नशे के इस काले कारोबार की चुप्पी बनी हुई है?
सूत्रों के अनुसार, कई बार प्रशासनिक अधिकारियों पर "ऊपर" से दबाव बनता है कि फलाँ व्यक्ति या दुकान पर हाथ न डाला जाए।
यूपी कनेक्शन और सुनियोजित लॉबी: रीवा में कैसे फैल रहा है ज़हर?
रीवा जिला उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा है, जहाँ से थोक में प्रतिबंधित दवाएं, कफ सिरप, ब्राउन शुगर की खेप चुपचाप मऊगंज, चाकघाट, सिरमौर, नईगढ़ी जैसे क्षेत्रों में पहुँचाई जाती हैं।
यहाँ से आगे इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों और शहरों में "नेटवर्क" के ज़रिए छोटे-छोटे डीलरों तक पहुँचाया जाता है।
स्थानीय पुलिस केवल उन चेहरों को पकड़ती है, जिनसे "सैटिंग" नहीं हो पाई या जिनका आपसी टकराव सतह पर आ गया।
यह पूरी व्यवस्था एक सुनियोजित काली कमाई लॉबी बन चुकी है, जिसमें अपराध और व्यवस्था का घिनौना गठजोड़ दिखाई देता है।
सामाजिक और मानवीय संकट: परिवार बर्बादी की कगार पर
रीवा के गाँवों और कस्बों में दर्जनों ऐसे परिवार मिलते हैं, जिनके युवा नशे की लत में बर्बाद हो चुके हैं।
कई माता-पिता अपने बच्चों के इलाज या अंतिम संस्कार तक के लिए कर्ज में डूब चुके हैं।
किसी के बेटे ने आत्महत्या कर ली, किसी की बेटी की ज़िंदगी बर्बाद हो गई — मगर न प्रशासन जागा, न समाज।
यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवता का गंभीर संकट है, जहाँ चुप्पी और डर ने हर घर को मौन बना दिया है।
यदि यह हालात यूँ ही बने रहे तो वह दिन दूर नहीं जब रीवा "नशे के पंजाब" की संज्ञा से पुकारा जाने लगे।
अब जरूरत है खुली बहस, उच्चस्तरीय जांच और सामाजिक चेतना की।
वरना रीवा की जेलें, श्मशान और सड़कें — तीनों ही एक ही ज़हर के अलग-अलग रूप बन जाएँगे।

