देवतालाब: श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि, जहां स्वयं विश्वकर्मा ने एक ही रात में रचा भोलेनाथ का दिव्य धाम
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा, मप्र शैलेन्द्र मिश्रा)
विंध्य अंचल की पुण्यभूमि रीवा न केवल प्राकृतिक सौंदर्य व सांस्कृतिक वैभव के लिए जानी जाती है, बल्कि यहां ऐसे धार्मिक चमत्कारों और आध्यात्मिक रहस्यों की परंपरा भी जीवंत है, जिनका संबंध सीधे त्रेता युग से जुड़ा है। रीवा नगर से 50 किलोमीटर दूर स्थित देवतालाब शिव मंदिर ऐसा ही एक स्थान है, जिसकी आस्था, ऐतिहासिकता और अलौकिकता आज भी लोगों को अचंभित करती है। मान्यता है कि यह मंदिर न केवल हजारों वर्ष पुराना है, बल्कि इसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में किया था।
श्रृंगी ऋषि की तपोस्थली, जहाँ प्रकट हुए भोलेनाथ
धार्मिक किंवदंती है कि त्रेता युग में श्रृंगी ऋषि घने जंगलों से आच्छादित इस स्थान पर आकर तपस्यारत हुए थे। उन्होंने शिवजी की कठिन साधना की और प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। उसी समय शिवलिंग प्रकट हुआ और भगवान ने श्रृंगी ऋषि को यहीं मंदिर निर्माण का आदेश दिया।
भगवान विश्वकर्मा का चमत्कार : एक ही रात में तराशा गया पत्थर बना भव्य मंदिर
श्रृंगी ऋषि की तपस्या और शिव के आदेश पर देवताओं के शिल्पाचार्य भगवान विश्वकर्मा ने एक विशाल चट्टान को तराश कर रातों-रात यह अद्वितीय मंदिर निर्मित किया। यही नहीं, मंदिर के चारों ओर जलाभिषेक हेतु तालाबों का निर्माण भी उन्होंने किया। इन्हीं तालाबों के कारण इस क्षेत्र का नाम ‘देवतालाब’ पड़ा।
चारों धाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है बिना देवतालाब दर्शन के
श्रद्धालु मानते हैं कि केदारनाथ, बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी और रामेश्वरम की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक श्रृंगेश्वर नाथ के दर्शन न किए जाएं। इसलिए यहां ‘चारधाम यात्रा’ के पश्चात विशेषतः श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ को रोट का प्रसाद अर्पित करते हैं।
शिवलिंग जो दिन में चार बार बदलता है रंग
देवतालाब के गर्भगृह में स्थित श्रृंगेश्वर नाथ शिवलिंग की विशेषता यह है कि इसका रंग दिन में चार बार परिवर्तित होता है – भोर में हलका सफेद, दोपहर में नीला, शाम को गुलाबी और रात्रि में काला। यह वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रहा है, तो श्रद्धालुओं के लिए यह शिव की दिव्यता का प्रमाण।
मंदिर के नीचे छिपा है रहस्य : दूसरा मंदिर और चमत्कारी मणि
स्थानीय मान्यता है कि श्रृंगेश्वर नाथ मंदिर के नीचे एक और मंदिर स्थित है, जो अब बंद है। प्राचीन सुरंगनुमा मार्ग से वहां पहुंचा जा सकता था, जो वर्षों पूर्व खतरनाक जीव-जंतुओं के कारण बंद कर दिया गया। कहा जाता है कि वहां एक चमत्कारी मणि और खजाना सुरक्षित है, जिसकी रक्षा स्वयं नाग देवता करते हैं।
औरंगजेब की सेना को पड़ा भारी, शिवलिंग से निकला रक्त, दूध और गंगा जल
इतिहास गवाह है कि मुगल आक्रमणकारी औरंगजेब की सेना ने जब इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया, तो शिवलिंग पर प्रहार करने पर उसमें तीन दरारें पड़ीं। पहली से रक्त, दूसरी से दूध और तीसरी से गंगा की धारा बह निकली। इसी घटना के बाद मंदिर को अलौकिक माना जाने लगा और लाखों श्रद्धालु यहां उमड़ने लगे।
रीवा रियासत ने कराया मंदिर का संरक्षण और विस्तार
रीवा रियासत के महाराजाओं ने मंदिर परिसर के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। गर्भगृह में चार अतिरिक्त शिवलिंग स्थापित किए गए, साथ ही चार दिशाओं में चार छोटे मंदिरों का भी निर्माण कराया गया। मंदिर की स्थापत्य कला आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है।
श्रावण, अगहन और फाल्गुन में विशेष मेले, लाखों की संख्या में उमड़ते हैं श्रद्धालु
हर वर्ष श्रावण मास, अगहन और फाल्गुन में यहां विशेष शिवरात्रि मेलों का आयोजन होता है। दूर-दराज से आए श्रद्धालु जलाभिषेक कर परिवार सहित सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भंडारे और सत्संग की श्रृंखलाएं भी चलती हैं।
✍️ विशेष रिपोर्ट विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
देवतालाब न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय स्थापत्य, इतिहास और संस्कृति का गौरवशाली प्रतीक भी है। सरकार और पुरातत्व विभाग को चाहिए कि इस मंदिर को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित घोषित कर इसके पर्यटन विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए। साथ ही जनमानस को भी चाहिए कि वे इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गरिमा बनाए रखें।



