रीवा जिला अंतर्गत जनपद पंचायत गंगेव की गढ़ पंचायत में नाली निर्माण बना जन-सुरक्षा के लिए खतरा, पुरानी बस्ती और स्कूली बच्चों की जान जोखिम में, प्रशासन मौन क्यों?
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले की मनगवा तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत गढ़ एक ऐतिहासिक और घनी आबादी वाली पंचायत है, जिसकी नींव संघ 1800 के आसपास पड़ी मानी जाती है। यहां आज भी सैकड़ों साल पुराने मकान मौजूद हैं, जिनमें से अधिकांश बिना मजबूत नींव और बिना पिलर के खड़े हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि इतनी संवेदनशील और पुराने निर्माण वाली बस्ती में हाल ही में जो नाली निर्माण कार्य शुरू किया गया है, वह न तो तकनीकी दृष्टि से सुरक्षित है, न पर्यावरणीय रूप से उपयोगी और न ही जन-सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया है।
बिना योजना, बिना निकासी, सिर्फ बजट खपत का खेल!
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जनपद पंचायत और संबंधित विभागों के जिम्मेदार अधिकारी–कर्मचारियों ने मात्र कागजी खानापूर्ति और बजट खपत के उद्देश्य से नाली निर्माण की एक सूची तैयार की और उसे बिना भौगोलिक व तकनीकी अध्ययन के मंजूरी दे दी। यही वजह है कि जिस क्षेत्र में नालियां बनाई जा रही हैं, वहां पानी की अंतिम निकासी की कोई व्यवस्था ही नहीं है।
पिछले कई वर्षों से पंचायत क्षेत्र में जब-जब नाली बनाई गई, वह कुछ समय बाद टूट गई, या फिर सरपंच बदलने के साथ ही उसे तोड़कर नया निर्माण प्रारंभ कर दिया गया। हर बार नई नाली, नया ठेका, और वही पुरानी लापरवाही।
बच्चों की सुरक्षा पर खतरा, हादसे की आशंका
सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि जिस बाजार क्षेत्र में यह नाली बनाई जा रही है, वहीं पास में कन्या शाला, प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इस मार्ग से प्रतिदिन सैकड़ों स्कूली बच्चे आते-जाते हैं। निर्माणाधीन नालियों के किनारे कोई सुरक्षा बैरिकेडिंग नहीं है, खुदाई के गड्ढे खुले पड़े हैं, और बारिश के मौसम में कीचड़ और फिसलन का आलम यह है कि कभी भी कोई मासूम बच्चा गंभीर हादसे का शिकार हो सकता है।
पुरानी बस्ती पर भी गिरने का खतरा मंडरा रहा
गढ़ पंचायत की बस्ती आज भी पुराने जमाने की शैली में बनी हुई है। यहां के अधिकांश घर मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने हैं, जो बिना पिलर और नींव के टिके हुए हैं। नाली की खुदाई ठीक इन मकानों के समीप की जा रही है, जिससे जल कटाव और कंपन के चलते घरों के ढहने का खतरा बढ़ गया है। एक ओर से नाली, दूसरी ओर बारिश का पानी — हालात किसी भी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने दी थी चेतावनी, फाइलेरिया के मच्छर पाए गए थे
कुछ वर्षों पूर्व स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम ने इसी बाजार क्षेत्र में फाइलेरिया और मच्छरजनित रोगों की जांच की थी, जिसमें भारी मात्रा में संक्रामक मच्छरों की पुष्टि हुई थी। बावजूद इसके, आज तक इस क्षेत्र की जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किया गया।
क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ भूमिपूजन तक सीमित है?
स्थानीय जनप्रतिनिधियों — चाहे वे पंचायत स्तर पर हों या विधायक-सांसद — की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। निर्माण कार्य की शुरुआत के पहले कोई सर्वे नहीं, कोई सार्वजनिक सूचना नहीं, कोई जन-सुनवाई नहीं। आखिर यह लोकतंत्र किसके लिए है? क्या जनहित सिर्फ कागजों तक सीमित है और जमीन पर सिर्फ ठेकेदारी संस्कृति हावी है?
प्रशासन की चुप्पी भी चिंताजनक
क्या जनपद पंचायत गंगेव ने इस कार्य की स्वीकृति देने से पहले कोई भू-प्राकृतिक सर्वे कराया था?
क्या जिला कलेक्टर रीवा को इस निर्माण की जानकारी है? अगर है तो उन्होंने सुरक्षा और स्थायित्व का निरीक्षण क्यों नहीं कराया?
क्या संभागीय आयुक्त को ऐसे निर्माणों की गुणवत्ता और आवश्यकता का सालाना आकलन नहीं करना चाहिए?
इन सभी सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे। जनता अब सिर्फ मूकदर्शक नहीं रहेगी।
ग्रामीणों की मांग — हो उच्च स्तरीय जांच, दोषियों पर हो कठोर कार्रवाई
गढ़ पंचायत के नागरिकों ने जिला प्रशासन, संभागीय आयुक्त और सरकार से मांग की है कि इस पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच करवाई जाए। यह जांच स्पष्ट करे कि किस आधार पर नाली निर्माण प्रारंभ हुआ, बजट का कितना उपयोग हुआ, और क्या कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है? की नहीं पूर्व में बनी नली क्यों क्यों ढह रही है दोषियों के ऊपर कार्यवाही हो और ग्रामीणों की हर संभव मदद हो।
अगर इसमें लापरवाही या भ्रष्टाचार की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों, इंजीनियरों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जाए, जिससे भविष्य में ऐसे मनमाने निर्माणों पर रोक लगे और जनता के जीवन व स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
यह सिर्फ गढ़ पंचायत की कहानी नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की उन तमाम पंचायतों की हकीकत है, जहां जनता की आवाज विकास के नारों में दबा दी जाती है। वक्त आ गया है कि जनता सवाल पूछे और जवाबदेही तय करे


