रीवा जिले में खाद संकट गहराया, कालाबाजारी पर उठे सवाल –सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने सरकार को ठहराया जिम्मेदार
रीवा। रीवा सहित पूरे विंध्य क्षेत्र में खाद संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा है। किसान बुवाई के सीजन में खाद की कमी से जूझ रहे हैं और मजबूरी में कालाबाजारी का शिकार हो रहे हैं। इस गंभीर समस्या को लेकर समाजसेवी शिवानंद द्विवेदी ने सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए कहा है कि किसानों की इस दुर्दशा के लिए केवल और केवल सरकार ही जिम्मेदार है।
किसानों की बढ़ती परेशानी
शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि इस समय प्रदेश के लगभग हर जिले में खाद का संकट है, परंतु यदि हम रीवा जिले पर विशेष तौर से ध्यान दें तो हालत अत्यंत चिंताजनक हैं। त्यौंथर, मनगवां, सिरमौर, हनुमना, जवा, रायपुर-कर्चुलियान और गंगेव जैसे लगभग आठों तहसीलों में सहकारी समितियां खाली पड़ी हैं। यहां किसान रोज लाइन लगाते हैं, लेकिन खाद मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
प्रशासन के दावों पर सवाल
उन्होंने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन और सरकार केवल कागजों में व्यवस्था दिखा रही है। हाल ही में कलेक्टर ने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया था कि रीवा जिले में खाद की कई रैक पहुंच चुकी हैं। लेकिन हकीकत यह है कि समितियों तक खाद नहीं पहुंच पा रही है। आखिर वह खाद कहां जा रही है? यह सबसे बड़ा सवाल है।
कालाबाजारी का खेल
द्विवेदी ने गढ़-लोरी समिति का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां पर एक हजार बोरी खाद का स्टॉक आया था। लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में सिर्फ 100 बोरी का वितरण हुआ और शेष 900 बोरी अचानक “गायब” हो गई। यह साफ संकेत है कि खाद की खुली कालाबाजारी चल रही है।
उन्होंने कहा कि व्यापारियों के पास यूरिया खाद 600 से 700 रुपये प्रति बोरी के दाम पर उपलब्ध है। जबकि समितियों से यह किसानों को नियमानुसार लगभग आधे दाम पर मिलनी चाहिए थी। कई व्यापारियों ने खुद स्वीकार किया है कि उन्हें ब्लैक मार्केट से खाद 400 रुपये प्रति बोरी में मिल रही है और वे 450 रुपये में बेचने को विवश हैं।
किसानों की मजबूरी
स्थिति यह है कि किसान समितियों के चक्कर काटते हैं लेकिन खाद नहीं मिलने पर उन्हें मजबूरी में महंगे दामों पर व्यापारियों से खरीदना पड़ता है। ऐसे में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और किसानों की आर्थिक स्थिति और भी कमजोर होती जा रही है।
सरकार पर सीधा निशाना
शिवानंद द्विवेदी ने सवाल उठाया –
आखिर समितियों तक खाद क्यों नहीं पहुंच रही है?
किसानों को महंगे दामों पर खाद खरीदने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
अगर खाद की रैक आई हैं तो उसका सही वितरण क्यों नहीं हो रहा है?
उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। खाद संकट से किसान बुरी तरह परेशान हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
चिंता का विषय
द्विवेदी ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते सरकार और प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए तो आगामी बुवाई सीजन गंभीर रूप से प्रभावित होगा। खाद की कालाबाजारी और किसानों की लाचारी प्रदेश के लिए बड़े संकट का संकेत है।

