मनगवा विधानसभा क्षेत्र में वायरल वीडियो से गरमाई सियासत, समाज विशेष पर बयान ने खड़े किए कई सवाल
संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक ताने-बाने पर चोट या फिर राजनीतिक गणित का विश्लेषण?
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मऊगंज मध्यप्रदेश
राजनीति में स्थायी न कोई मित्र होता है और न कोई शत्रु—सत्ता की कुर्सी ही अंतिम लक्ष्य बन चुकी है। आज की राजनीति में नीतियों और सिद्धांतों से ज़्यादा महत्व है समीकरणों और सीटों का। कुछ ऐसा ही संदेश देता हुआ एक वीडियो इन दिनों मंगावां विधानसभा क्षेत्र से सामने आया है, जिसने राजनीतिक हलकों से लेकर आमजन में चर्चा का बाजार गर्म कर दिया है।
वीडियो में कथित तौर पर मनगवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति एक समाज विशेष को संबोधित करते हुए यह कहते सुने जा रहे हैं कि "यह समाज भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं देता। यदि देता भी है तो रीवा में राजेन्द्र शुक्ल, सिरमौर में दिव्यराज सिंह और देवतालाब में गिरीश गौतम को वोट देता है। लेकिन जब मनगवा में यही समाज हाथ जोड़कर आता है, तब जाकर कुछ वोट मिलते हैं।"
इस कथन के बाद एक बार फिर यह प्रश्न गहराता जा रहा है कि क्या लोकतंत्र में जनता की स्वतंत्र राय का आदर नहीं होना चाहिए? क्या एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ लेने के बावजूद जातीय टिप्पणियों से बचना नहीं चाहिए? यह बयान न सिर्फ समाज को बाँटने वाला प्रतीत होता है, बल्कि यह संविधान की उस मूल भावना पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है जिसमें प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और सम्मान की गारंटी दी गई है।
राजनीति में सिद्धांत की जगह गणित?
2025 की राजनीति में मनगवा क्षेत्र को लेकर यह धारणा बनती जा रही है कि विधानसभा सामान्य हो जाएगी। परंतु जब तक आरक्षण नीति में बदलाव नहीं होता, यह केवल एक भ्रम साबित हो सकता है। यदि भविष्य में मनगवा पुनः आरक्षित हो गया, तो जो नेता आज राजनीतिक गणित के सहारे साधना कर रहे हैं, वे तब जमीनी सच्चाई से दो-चार हो सकते हैं।
रीवा और मऊगंज के बीच राजनीतिक प्रभाव रखने वाले इस क्षेत्र में यह भी सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा को अपने ही संगठन में कोई योग्य स्थानीय चेहरा नहीं मिल रहा है, जिसके चलते आयातित नेताओं को आगे बढ़ाया जा रहा है? इससे पार्टी की जड़ों और मूल कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ सकता है।
संविधान और सामाजिक मर्यादा का सवाल
यदि यह वीडियो प्रमाणित है और इसमें दिए गए बयान सत्य हैं, तो यह न केवल एक राजनीतिक चूक है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी चोट पहुंचाने वाली टिप्पणी है। संविधान का स्पष्ट निर्देश है कि जनप्रतिनिधि किसी जाति, धर्म, वर्ग अथवा भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे। ऐसे में समाज विशेष के विरुद्ध दिया गया कोई भी सार्वजनिक बयान देश की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
नेता का पक्ष उपलब्ध नहीं
इस संबंध में मनगवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति से संपर्क करने का प्रयास किया गया, किंतु समाचार लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका। उनके पक्ष की प्रतीक्षा है। यदि उनका स्पष्टीकरण प्राप्त होता है तो उसे भी उचित स्थान पर प्रकाशित किया जाएगा।
अब देखना यह है कि यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी बनकर रह जाता है या फिर सामाजिक संगठनों, निर्वाचन आयोग अथवा अदालतों तक पहुँचता है। यह आने वाला समय बताएगा कि समाज और संविधान को आहत करने वाले बयानों पर कार्रवाई होती है या फिर सबकुछ समय के गर्त में चला जाता है।

