आदेश तो जारी हो जाते हैं, लेकिन अमल क्यों लटक जाता है? जनता न्याय की राह में भटक रही, जवाबदेही तय करने से बच रहा प्रशासन
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन-प्रशासन का सबसे बड़ा दायित्व है जनता को त्वरित न्याय दिलाना और आदेशों का समयबद्ध पालन सुनिश्चित करना। संविधान और कानून इसी उद्देश्य से बनाए गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आदेश जारी होने के बाद भी वे महीनों तक फाइलों और प्रक्रिया की भूल-भुलैया में दबकर रह जाते हैं। नतीजा यह कि आमजन आज भी न्याय की राह में भटकने को मजबूर है।
📜 तहसील गुढ़ का ताज़ा मामला
तहसील गुढ़ (रीवा) से जारी आदेश संख्या 261/तहगुढ़/2025 दिनांक 13 अगस्त 2025 इसका ताजा उदाहरण है। इसमें राजस्व प्रकरण क्रमांक 0014/68/2024-25 के तहत अनावेदक रामसजीवन कुशवाहा निवासी पुरारा के अतिक्रमण को हटाने का निर्देश दिया गया है। न्यायालय ने 23 दिसंबर 2024 को ही आदेश पारित किया था कि संबंधित भूमि (ग्राम पुरारा, खसरा नंबर 98, रकबा 0.101 हेक्टेयर) को अतिक्रमण मुक्त किया जाए।
लेकिन आदेश जारी होने के आठ माह बाद भी अतिक्रमण जस का तस बना हुआ है। अब तहसीलदार ने संबंधित हल्का पटवारियों और पुलिस प्रशासन को सात दिन के भीतर अतिक्रमण हटाकर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश तो जारी कर दिया है, पर सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक आदेश को ठंडे बस्ते में क्यों रखा गया?
⚖️ न्याय केवल ‘पहुंच’ वालों तक सीमित
जमीनी हालात बताते हैं कि न्याय केवल उन्हीं तक पहुँच पाता है, जिनकी राजनीति, प्रशासन या संवैधानिक स्तर पर मजबूत पकड़ और ‘पहुंच’ होती है। यदि मामला किसी बड़े ठेकेदार या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा हो तो आदेश का पालन 24 घंटे के भीतर ही हो जाता है। लेकिन आमजन के मामलों में अधिकारी बहानेबाज़ी, फाइलों का अंबार और प्रक्रिया की देरी का हवाला देकर आदेश को टालते रहते हैं।
⏳ समयसीमा बीतने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
कानून कहता है कि हर आदेश के पालन की एक तय समय-सीमा होती है। यदि वह समयसीमा बीत जाए तो संबंधित अधिकारी पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। मगर असलियत यह है कि न तो जिम्मेदारी तय होती है और न ही जनता को यह बताया जाता है कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ।
क्या कारण था देरी का?
किस स्तर पर फाइल अटकी?
किस अधिकारी ने टालमटोल की?
इन सवालों के जवाब आमजन को कभी नहीं मिलते।
📑 पारदर्शिता और जवाबदेही गायब
आदेशों के पालन में हो रही देरी पर न तो कोई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है और न ही जनता को सूचना दी जाती है। आदेश की प्रति तक समय पर उपलब्ध नहीं होती। इससे स्थिति आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती है और असलियत पर से परदा कभी नहीं उठ पाता।
🚨 लोकतंत्र का असली चेहरा?
वर्तमान व्यवस्था में आम जनता दर-दर भटक रही है। न्याय की उम्मीद में लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, जबकि सत्ता और प्रशासन पर बैठे जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर बैठे हैं। सवाल यह है कि क्या यही लोकतंत्र की असली तस्वीर है?
यदि यही प्रणाली बनी रही तो जनता का लोकतंत्र से विश्वास कमजोर होता जाएगा और आने वाले समय में लोकतंत्र की परिभाषा शायद आमजन अपने कटु अनुभवों के आधार पर अलग ही लिखने लगे।

