रीवा में सरकारी डॉक्टरों की "निजी दुकानदारी" — इलाज के नाम पर गरीबों की जेब पर डाका, प्रशासन मौन
विंध्य वसुंधरा समाचार/ रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले में शासकीय स्वास्थ्य तंत्र का हाल बदतर होता जा रहा है। यहां सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों पर लोगों का भरोसा उठता जा रहा है, और इसकी मुख्य वजह है — डॉक्टरों का दोहरा चरित्र। एक ओर ये शासकीय पद पर हैं, तो दूसरी ओर निजी क्लीनिक, पैथोलॉजी और नर्सिंग होम की श्रृंखला चला रहे हैं। इस "मुनाफा आधारित चिकित्सा तंत्र" के चलते सबसे अधिक शोषण हो रहा है गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों का।
पैथोलॉजी की मिलीभगत से शुरू होती है मरीज की लूट
शासकीय चिकित्सक अपने-अपने क्लीनिकों में निजी पैथोलॉजी खोलकर जांच के नाम पर खुलेआम 1200 से 1500 रुपये तक वसूल रहे हैं। मरीजों का खून इन्हीं सेटिंग वाले पैथोलॉजी सेंटर में भेजा जाता है, जहाँ मनचाही रिपोर्ट बनाई जाती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और फिर मरीज को किसी न किसी "संबद्ध" नर्सिंग होम या प्राइवेट अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है।
इन डॉक्टरों द्वारा ऐसी रिपोर्टें तैयार करवाई जाती हैं, जिनके दम पर सामान्य लक्षणों को गंभीर रोग में तब्दील कर दिया जाता है — फिर शुरू होता है लूट का खेल। यही कारण है कि आज रीवा का गरीब मरीज भी डर के कारण सरकारी अस्पताल से अधिक विश्वास प्रयागराज जबलपुर, बनारस या नागपुर के प्राइवेट सिस्टम पर करने लगा है।
800 बिस्तर का अस्पताल बना 'रेफरल सेंटर' — नहीं मिल रही न तो सस्ती चिकित्सा, न पारदर्शिता
रीवा में बनाये गए 800 बिस्तर की संजय गांधी अस्पताल से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं। माना गया था कि अब रीवा संभाग में दिल्ली-मुंबई जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं कम खर्च में मिलेंगी। परंतु हकीकत इसके ठीक उलट है। आज यह अस्पताल रेफरल का एक मंच बन गया है — जहाँ से मरीजों को निजी अस्पतालों में भेजकर उनका आर्थिक दोहन किया जा रहा है।
सामान्य सिर दर्द, चक्कर, थकान जैसे लक्षण लेकर आए मरीजों को सीधा ₹8000-₹10,000 की महंगी एमआरआई, सीटी स्कैन और अन्य जांचों में डाल दिया जाता है, फिर दवाएं भी वही जो क्लीनिक से जुड़ी मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध हैं। यह पूरा सिस्टम एक साजिश की तरह काम कर रहा है — डॉक्टर, पैथोलॉजिस्ट, मेडिकल स्टोर, नर्सिंग होम — सब आपस में 'प्रॉफिट शेयरिंग' में लगे हैं।
आयुष्मान कार्ड भी बना कागज का टुकड़ा — योजना का दुरुपयोग चरम पर
"आयुष्मान भारत योजना" को केंद्र सरकार ने देश के गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा कवच के रूप में लागू किया था। लेकिन रीवा में यह योजना भी चिकित्सकों के लिए कमाई का जरिया बन चुकी है। कार्ड होने के बावजूद मरीजों से जांच, भर्ती और इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है।
ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ निजी डॉक्टरों ने आयुष्मान कार्ड धारकों से ₹3000-₹5000 तक वसूले और पर्चियों में सिर्फ ₹500 का उल्लेख किया। न ही जांचें ट्रैक होती हैं, न ही बिलों की वैधता। स्वास्थ्य विभाग की निरीक्षण प्रणाली कागजों तक सीमित है, और जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण में आंखें मूंदे बैठा है।
स्वास्थ्य मंत्री के गृह संभाग में ही चिकित्सा का यह हाल — क्या अब भी नहीं होगा हस्तक्षेप?
यह विडंबना ही है कि मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला का गृह जिला रीवा है — और वहीं का स्वास्थ्य तंत्र पूरी तरह से चरमरा चुका है। जब मंत्री जी के अपने जिले में यह स्थिति है, तो बाकी जिलों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्या प्रदेश सरकार यह स्वीकार करने को तैयार है कि रीवा में स्वास्थ्य तंत्र निजी व्यापार में तब्दील हो चुका है? क्या मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इस पर संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई करेंगे?
या फिर यह व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी — जहाँ इलाज नहीं, बल्कि लूट-खसोट, कमीशनखोरी और प्राइवेट गठजोड़ का बोलबाला है?
जनता का सवाल: क्या रीवा में शासकीय अस्पताल गरीबों के लिए हैं या अमीर डॉक्टरों की कमाई का जरिया?
रीवा संभाग की जनता अब पूछ रही है — क्या यह वह स्वास्थ्य व्यवस्था है जिसकी कल्पना हमारे जनप्रतिनिधियों ने की थी? क्या गरीबों को सरकारी अस्पतालों में भी इंसाफ और ईलाज मिल पाना अब सपना बन गया है?
यदि अब भी शासन-प्रशासन की आंखें नहीं खुलतीं, तो यह समझ लेना होगा कि व्यवस्था का पतन नीचे तक पहुंच चुका है। रीवा को ईलाज नहीं, एक ईमानदार हस्तक्षेप की जरूरत है — ताकि स्वास्थ्य को सेवा से जोड़ा जा सके, न कि व्यवसाय से।
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यह समाचार सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दर्ज महिला के कथित बयान के आधार पर तैयार किया गया है। विंध्य वसुंधरा समाचार इस वीडियो अथवा उसमें लगाए गए किसी भी आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। हमारी मंशा किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करने की नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता लाने की है।
इस प्रकरण की सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। वीडियो में जो भी कथित घटनाएं दर्शाई गई हैं, उनकी सत्यता और परिस्थितियों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा की जानी शेष है।


