जीवात्मा का ईश्वर से संबंध ही शाश्वत, जगत की आसक्ति मात्र माया – आचार्य डॉ. गौरीशंकर शुक्ला
कैथा में श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिवस भक्तों ने अमृतमयी वाणी का किया रसपान
रीवा, 15 अगस्त 2025 (स्पेशल ब्यूरो) विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले के ग्राम कैथा स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रहे श्रीमद् भागवत महायज्ञ एवं कथा ज्ञानयज्ञ का तीसरा दिवस भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण से परिपूर्ण रहा। प्रातः काल से ही मंदिर परिसर में भक्तों का आगमन प्रारंभ हो गया था। हर कोई उत्सुक था व्यासपीठ पर विराजमान आचार्य डॉ. गौरीशंकर शुक्ला के मुखारविंद से अमृतमयी वाणी सुनने के लिए।
कथा के मुख्य प्रसंग
तीसरे दिवस के कथा प्रवाह में सती कथा, ध्रुव चरित्र, अजामिल उपाख्यान और जड़ भरत प्रसंग का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। आचार्य की मधुर वाणी और शास्त्रसम्मत व्याख्यान ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अध्यात्म की गहराइयों तक पहुंचा दिया। पांडाल में बैठा हर श्रोता मानो कथा के चरित्रों को अपने सामने घटित होते हुए देख रहा था।
ईश्वरीय न्याय में केवल अपकर्मी को भय
कथा के दौरान डॉ. शुक्ला ने जीवन के सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा –
“भगवान प्रत्येक जीव को कुछ न कुछ देते हैं, परंतु अंततः हर व्यक्ति से उसके कर्मों का हिसाब अवश्य लेते हैं। जिसका लेखा-जोखा ईमानदार है, उसे कभी ईश्वरीय न्याय से भय नहीं लगता। लेकिन जो छल, कपट और अनैतिक आचरण करता है, वही न्याय के दिन डरता है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति ही ईश्वर की परीक्षा में सफल होता है और सच्ची शांति प्राप्त करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि काल के भी महाकाल परमात्मा हैं, और उनकी शरण में जाने से ही मोक्ष का द्वार खुलता है।
जगत का मोह – क्षणभंगुर, ईश्वर का संबंध – शाश्वत
आचार्य डॉ. शुक्ला ने माया और मोक्ष के तत्वज्ञान को स्पष्ट करते हुए कहा –
“जीव इस दृश्य संसार के मोह में उलझकर इसे ही सत्य मान बैठता है। वास्तव में, पति-पत्नी, माता-पिता, संतान जैसे सभी लौकिक संबंध मात्र इस जीवन तक सीमित हैं। शास्त्र कहते हैं कि जीवात्मा का केवल ईश्वर से ही अटूट और शाश्वत संबंध है। लौकिक रिश्तों का निर्वहन पूरी निष्ठा और कर्तव्यबोध से करना चाहिए, किंतु उनमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। जो मनुष्य ईश्वर के साथ अपने संबंध को सर्वोपरि मानकर कर्मपथ पर अविचल चलता है, वही जीवन के परम लक्ष्य – मोक्ष – को प्राप्त करता है।”
एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति – सत्य एक, नाम अनेक
वेदांत दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा –
“ईश्वर एक हैं, उनके अनेक नाम और स्वरूप हैं। ज्ञानीजन उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं – श्रीकृष्ण धनुष-बाण धारण करते हैं तो राम कहलाते हैं, चक्र-गदा धारण करते हैं तो विष्णु, और त्रिशूल-डमरू लेकर तांडव करते हैं तो शिव। स्वरूप कोई भी हो, वह एक ही परमात्मा हैं। व्यक्ति को जिस रूप में ईश्वर प्रिय लगें, उसी का स्मरण, पूजन और ध्यान करना चाहिए, किंतु सभी रूपों में एकता का भाव रखना आवश्यक है।”
भक्ति और आस्था का वातावरण
कथा के दौरान मंदिर प्रांगण में हर-हर महादेव और जय श्रीराम के उद्घोष गूंजते रहे। पांडाल में सुगंधित पुष्पों की महक और मंत्रोच्चारण की पवित्र ध्वनि ने वातावरण को दिव्य बना दिया। श्रोताओं में बुजुर्ग, युवा, महिलाएं और बच्चे सभी शामिल थे, जो कथा के हर प्रसंग को गहरी तन्मयता से सुन रहे थे।
यह श्रीमद् भागवत महायज्ञ आगामी दिनों तक जारी रहेगा। आयोजकों ने सभी श्रद्धालुओं से निवेदन किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में आकर कथा श्रवण का पुण्य अर्जित करें।




