रीवा जिले में गौशाला और गौ संरक्षण पर सवाल
अवैध तस्करी, मृत गायों का जेसीबी से दफनाना, पुलिस-प्रबंधन और नेताओं की मिलीभगत से जनता में गहरी नाराज़गी
मध्यप्रदेश का रीवा जिला विकास की गाथाओं और बड़े-बड़े शिलान्यासों का गवाह रहा है। यहां नेताओं को “विकास पुरुष” कहकर सम्मानित किया जाता रहा है। लेकिन आज हालात यह हैं कि विकास की इन चमकदार तस्वीरों के पीछे गौ संरक्षण जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी बुरी तरह उपेक्षित है।
रीवा जिले में प्रदेश की सबसे बड़ी गौशाला स्थापित है। यहां समय-समय पर उद्घाटन, नामकरण और शिलान्यास का सिलसिला चलता रहता है। मगर हकीकत यह है कि न तो गौशाला में पर्याप्त सुविधा है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों में संवेदनशीलता। नतीजतन, दर्जनों गायें तड़प-तड़पकर मर जाती हैं और फिर उन्हें जेसीबी मशीन से उठाकर गड्ढों में दफना दिया जाता है या खाई में फेंक दिया जाता है।
हिनौती मोड़ पर ग्रामीणों ने पकड़ा पिकअप
1 सितंबर 2025 की रात 8–9 बजे थाना गढ़ क्षेत्र के हिनौती मोड़ पर ग्रामीणों ने संदिग्ध पिकअप वाहन पकड़ा। यह वाहन अवनीश कुमार चतुर्वेदी उर्फ लाला निवासी हिनौती का था, जो गौधाम में स्वयं को गौ सेवक बताता है। पिकअप में गौवंश भरे हुए थे। मौके पर पहुंचे आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी की मौजूदगी में वाहन से गायों को बाहर निकाला गया। इस घटना ने प्रशासनिक जिम्मेदारी और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आदेश और हकीकत में बड़ा अंतर
21 जुलाई 2025 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अनुविभाग सिरमौर, जिला रीवा ने आदेश जारी किया था कि:
“गौशाला हिनौती में पहले से ही पर्याप्त संख्या में गौवंश मौजूद हैं। शेड निर्माण कार्य अपूर्ण है। जब तक यह कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक अतिरिक्त गौवंशों को प्रवेश न दिया जाए।”
लेकिन वास्तविकता यह है कि आदेश के बावजूद गौशाला प्रबंधन और कुछ स्थानीय प्रभावशाली लोग आपसी लेन-देन के आधार पर गायों को अंदर भेजते रहे। यही कारण है कि आदेश और ज़मीनी स्थिति में स्पष्ट विरोधाभास सामने आ रहा है।
इस पूरे प्रकरण में तीन पक्षों की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है –
1. गौशाला प्रबंधन
2. स्थानीय लोगों का नेटवर्क
3. पुलिस और चौकी स्तर के अधिकारी
सूत्रों का कहना है कि इसी मिलीभगत के चलते अवैध गौ तस्करी का कारोबार फल-फूल रहा है।
तस्करी का बड़ा नेटवर्क, पुलिस पर भी सवाल
रीवा जिले से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर आए दिन पशुओं की तस्करी होती है। पिकअप और ट्रक वाहनों से गाय, बकरी, भैंस, भेड़ और बछड़ों को खुलेआम ढोया जाता है। हाल ही में अगस्त माह में जमुई क्षेत्र से एक पिकअप पकड़ी गई थी, जिसे कथित तौर पर “निजी सेवा शुल्क” के नाम पर छोड़ दिया गया। यह दर्शाता है कि पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर संरक्षण प्राप्त किए बिना इतना बड़ा नेटवर्क चल पाना संभव नहीं है।
आस्था से खिलवाड़
प्रदेश में जब स्वयं को “सनातन धर्म की सरकार” कहने वाली भाजपा सत्ता में है, तब भी गौ हत्याओं और तस्करी के मामले कांग्रेस शासन की तुलना में अधिक सामने आ रहे हैं। यह स्थिति जनता की आस्था और विश्वास के साथ सीधा खिलवाड़ है।
लोगों का कहना है कि गौ माता केवल पोस्टर-बैनर और चुनावी भाषणों तक सीमित कर दी गई हैं। धरातल पर संरक्षण की बजाय उनकी दुर्दशा हो रही है।
“क्या यही है माता का स्वरूप? चौराहों पर चित्र और गौशालाओं में तड़पकर मृत्यु?” – यह सवाल अब आमजन के बीच गूंज रहा है।
विपक्ष की भूमिका भी कटघरे में
जहां सत्ता पक्ष पर संरक्षण और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, वहीं विपक्ष भी पूरी तरह नाकाम नजर आ रहा है। कांग्रेस और अन्य दल चुनावी मौसम में ही आवाज उठाते हैं, लेकिन सामान्य दिनों में इस गंभीर मुद्दे पर मौन साध लेते हैं। जनता का कहना है कि विपक्ष सिर्फ चुनाव का इंतजार कर रहा है, जबकि जनता रोज़ अपनी आस्था के साथ होता अन्याय देख रही है।
कठोर कार्रवाई की मांग
स्थानीय नागरिकों, समाजसेवियों और जागरूक वर्ग की मांग है कि –
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच हो।
गौशाला प्रबंधन, पुलिस और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों की जवाबदेही तय की जाए।
दोषी पाए जाने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
स्पष्टीकरण
यह समाचार स्थानीय सूत्रों एवं जांचर्चा पर आधारित है। अंतिम सत्यता केवल संबंधित विभागों की जांच उपरांत ही सामने आएगी।




