अवैध पैकारी के संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता एवं एडवोकेट बीके माला ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की रीवा के जिले में खुलेआम अवैध पैकारी: शासन-प्रशासन की चुप्पी, जनता का बढ़ता आक्रोश
रीवा संभाग की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान लगातार अवैध शराब कारोबार की मार झेल रही है। रीवा शहर के बनकुइया क्षेत्र में खुलेआम अवैध पैकारी (थोक शराब बिक्री) संचालित हो रही है। यह मामला केवल एक दुकान का नहीं, बल्कि एक ऐसे संगठित नेटवर्क का प्रतीक है जिसमें स्थानीय स्तर से लेकर बड़े अधिकारियों और राजनीतिक रसूखदारों तक की मिलीभगत के आरोप हैं। सवाल यह है कि जब जनता की आँखों के सामने दिन-दहाड़े शराब का कारोबार चले और जिम्मेदार विभाग खामोश रहें, तो क्या यह केवल अपराध है या आम लोगों के विश्वास का घोर अपमान?
मुख्यमंत्री के वादों की परीक्षा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में मंदिरों और धार्मिक नगरों में शराबबंदी लागू करने का वादा किया था। सरकार की नीति भी यही दर्शाती है कि सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों पर शराब बिक्री को प्रतिबंधित किया जाएगा। लेकिन जब रीवा जैसे शहर में ही खुलेआम अवैध शराब बिक रही हो, तो इन वादों की साख पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। जनता कह रही है—“सच्चाई कागज़ों पर नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए। अगर सरकार ईमानदार है तो अवैध दुकानों पर तत्काल छापेमारी होनी चाहिए।”
नए एसपी से उम्मीदें
रीवा जिले में हाल ही में पुलिस अधीक्षक शैलेंद्र सिंह चौहान की तैनाती हुई है। आम लोगों में यह उम्मीद जगी है कि अब हालात बदलेंगे। लेकिन यह बदलाव केवल नियुक्ति से नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी कार्रवाई से साबित होगा। नागरिक संगठनों की मांग है कि—
बनकुइया की अवैध दुकान पर बिना देरी छापा मारा जाए,
अवैध स्टॉक जब्त कर विधिक कार्रवाई की जाए,
दोषियों को गिरफ्तार कर जनता के सामने पेश किया जाए,
और जिन अधिकारियों ने अनदेखी की है, उनकी जवाबदेही तय हो।
अवैध कारोबार का संगठित जाल
रीवा संभाग में अवैध शराब कारोबार की गहराई का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लगभग हर गांव और हर थाने के क्षेत्र में अवैध दुकानें सक्रिय हैं। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार पूरे जिले के हर ग्राम पंचायत में 4-6 से अधिक अवैध पैकारी दुकानें चल रही हैं।
सूत्र बताते हैं कि इन दुकानों को माल सीधे सरकारी अधिकृत ठेका संचालकों से ही मिलता है। यानी यह कारोबार सिर्फ “अवैध” नहीं बल्कि “अर्ध-वैध” हो चुका है, जिसमें वैध ठेके और अवैध पैकारी आपस में मिलकर लाभ कमा रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि इस कारोबार में—
आबकारी विभाग,
परिवहन विभाग,
सत्ताधारी दल के विधायक, सांसद और मंत्रियों के करीबी,
और पुलिस महकमे तक की संलिप्तता की चर्चा है।
“सेवा शुल्क” का काला सच
स्थानीय लोगों का दावा है कि थाने और चौकियों के स्तर पर अवैध दुकानों से “सेवा शुल्क” वसूला जाता है।
ग्रामीण थानों पर ₹1,00,000 मासिक तक,
चौकियों पर ₹50,000 से ₹70,000 तक,
और हर पुलिसकर्मी (आरक्षक, प्रधान आरक्षक, एएसआई तक) का अलग-अलग हिस्सा तय।
यहाँ तक कि डायल-112 वाहन तक की “नियत राशि” होने की बातें ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय हैं।
गढ़ थाना क्षेत्र का उदाहरण
रीवा जिले के गढ़ थाना क्षेत्र को ही लें।
प्रॉपर गढ़ गांव में तीन अवैध दुकानें संचालित बताई जाती हैं।
वहीं पूरे थाना-चौकी क्षेत्र में हजारों हजार अवैध शराब की दुकानें सक्रिय हैं।
इससे साफ है कि रीवा जिले में शराब कारोबार केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक “जाल” बन चुका है जिसमें सरकारी और अवैध दोनों तरह की दुकानें मिलकर काम कर रही हैं।
पूर्व आईजी की कार्रवाई और सिस्टम की हार
रीवा के पूर्व आईजी गौरव सिंह राजपूत ने पद संभालते ही बड़ा अभियान चलाया था। उन्होंने सभी थानों और चौकियों के क्षेत्रों में सरकारी और अवैध दोनों दुकानों पर एक साथ छापेमारी कर कीर्तिमान स्थापित किया। उस समय जनता को उम्मीद जगी थी कि अब इस नेटवर्क का सफाया होगा।
लेकिन अफसोस, वह कार्रवाई भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई। समय बीतते-बीतते वही पुरानी स्थिति लौट आई। सूत्रों का कहना है कि “व्यवस्था” ने सबकुछ दबा दिया।
यह चक्र हर साल दोहराया जाता है। मार्च में ठेकों का दौर शुरू होता है, अप्रैल से जून तक विरोध और शोर मचता है, और उसके बाद सबकुछ “सेवा शुल्क” तय होते ही शांत हो जाता है।
सामाजिक संगठनों का आह्वान
सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट बी.के. माला का कहना है कि जनता अब केवल अधिकारियों की दिखावटी कार्रवाई देख-देखकर थक चुकी है। उन्होंने कहा—
“अब जनता जागेगी। यदि प्रशासन ईमानदार नहीं रहा, तो किसी बड़े से बड़े ताकतवर को भी जनता नहीं छोड़ेगी। रीवा संभाग की पवित्रता और यहाँ की सांस्कृतिक पहचान किसी भी राजनीतिक या कारोबारी हित के आगे नहीं झुक सकती।”
राजनीतिक और सामाजिक असर
अवैध शराब कारोबार का असर केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं है।
यह युवाओं और गरीब तबके को सीधे प्रभावित करता है।
ग्रामीण इलाकों में नशाखोरी बढ़ रही है।
अपराधों में शराब की भूमिका साफ दिखाई देती है।
और सबसे अहम, शासन-प्रशासन पर से जनता का विश्वास कमज़ोर हो रहा है।
जब जनता यह देखती है कि कानून सबके लिए समान नहीं, बल्कि रसूखदारों के लिए अलग है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है।



