📰 गढ़ की सड़क बनी मौत का कुंआ — विकास के वादों में दब गई सच्चाई, अब जनता ने ठाना “अब नहीं तो कभी नहीं ”
रीवा जिले के ग्राम पंचायत गढ़ की दर्दनाक हकीकत — जर्जर सड़क, डूबता जीवन, मौन शासन
रीवा जिले के अंतर्गत ग्राम पंचायत गढ़ की मुख्य सड़क, जो कभी राष्ट्रीय राजमार्ग-27 का हिस्सा थी, आज जर्जरता की चरम सीमा को पार कर चुकी है। सात साल पहले बनी यह सड़क अब इतनी टूट चुकी है कि लोगों ने इसे व्यंग्य में “स्विमिंग पूल रोड” कहना शुरू कर दिया है। यहां सड़क नहीं, बल्कि गड्ढे हैं। और ये गड्ढे केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की व्यवस्था, ईमानदारी और जवाबदेही में भी हैं।
बरसात के मौसम में यह सड़क जलभराव का केंद्र बन जाती है। कीचड़, धंसान और उफनता पानी लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल देता है। राहगीर फिसलते हैं, वाहन पलटते हैं, स्कूली बच्चे गिरते हैं और एंबुलेंस जैसी जरूरी गाड़ियां फंस जाती हैं। गढ़ की जनता के लिए यह मार्ग एक यातना मार्ग बन चुका है।
🕰️ सात साल का इतिहास — वादे बने मजाक
गढ़ की इस सड़क का निर्माण लगभग सात साल पहले कराया गया था। शुरू में सड़क अच्छी बनी थी, लेकिन अगले तीन सालों में इसमें दरारें दिखने लगीं। इसके बाद हर साल “मरम्मत” के नाम पर थोड़ा बहुत काम किया गया — कहीं गिट्टी गिराई गई, कहीं मिट्टी पटाई गई — लेकिन असली सुधार कभी नहीं हुआ।
आज हाल यह है कि यह मार्ग न सिर्फ पूरी तरह टूटा हुआ है, बल्कि बरसात के पानी के बहाव के कारण कई जगहों पर मिट्टी भी बह चुकी है, जिससे सड़क गड्ढों में तब्दील हो गई है। ग्रामीणों के मुताबिक, “यह अब सड़क नहीं, बल्कि तालाब बन चुकी है।”
💬 प्रमोद कुमार सिंह — “हम नक्शे से मिटा दिए गए हैं”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन और से जुड़े समाजसेवी प्रमोद कुमार सिंह ने इस स्थिति को लेकर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा —
“हम समाजसेवक हैं, जितना कर सकते हैं करते हैं, लेकिन जब तक शासन-प्रशासन सहयोग नहीं देगा, तब तक कोई सुधार संभव नहीं है। यह समस्या नई नहीं, पांच साल पुरानी है। नेताओं से चर्चा होती है, पर असर नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि हम लोग इस दुनिया के नक्शे से ही मिटा दिए गए हैं। न शासन ध्यान देता है, न प्रशासन, न सत्तापक्ष और न विपक्ष।”
उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं की सक्रियता सिर्फ चुनाव के वक्त दिखाई देती है।
“जिस दिन वोट लेने का समय आता है, उस दिन सभी दरवाजे पर पहुंच जाते हैं। वादे करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है, सभी गायब हो जाते हैं। जनता की पीड़ा सुनने कोई नहीं आता।”
⚙️ ग्राम पंचायत की निष्क्रियता — जनता भी जिम्मेदार
जब उनसे पूछा गया कि क्या ग्राम पंचायत या सचिव ने कभी निरीक्षण किया, तो उन्होंने कहा —
“ग्राम पंचायत हो, सचिव हो या स्थानीय प्रतिनिधि — सब एक समान जिम्मेदार हैं। कोई निरीक्षण नहीं हुआ, कोई रिपोर्ट नहीं भेजी गई। हर कोई जिम्मेदारी टाल रहा है। शासन कहता है कि पंचायत को देखना चाहिए, पंचायत कहती है कि जिला देखे। और इस चक्कर में जनता पिस रही है।”
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ग्रामीणों को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
“लोग अपने दरवाजे की सफाई तक ठीक से नहीं करते, सामूहिक आवाज़ नहीं उठाते। अगर गांव एकजुट होकर आवाज उठाए, तो अधिकारी मजबूर होंगे। लेकिन यहां आवाज उठाने वाले भी कुछ ही हैं, और सुनने वाला कोई नहीं।”
🛣️ स्थायी समाधान की मांग — “आरसीसी रोड और नाली जरूरी”
प्रमोद सिंह का कहना है कि हर साल गिट्टी गिराना कोई समाधान नहीं।
“दो दिन की मरम्मत और पांच दिन की बरसात — फिर वही हाल। इसका स्थायी हल यही है कि यहां आरसीसी रोड (सीमेंटेड सड़क) बने और दोनों ओर नालियों का निर्माण हो ताकि पानी बहाव के साथ निकल जाए।”
उन्होंने कहा कि सरकार को सिर्फ घोषणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि मैदानी स्तर पर कार्रवाई करनी चाहिए।
“गढ़ रीवा का हिस्सा है, कोई पराया गांव नहीं। यहां के लोग भी उतने ही करदाता हैं जितने शहरों के नागरिक, फिर यहां के साथ यह भेदभाव क्यों?”
🚨 दुर्घटनाओं की लिस्ट लंबी — मौत से बचना किस्मत
स्थानीय निवासी मनीष केशरवानी ने सड़क की स्थिति को भयावह बताते हुए कहा —
“यह सड़क पिछले तीन-चार सालों से गड्ढों में है। बरसात में तो हालात और भी खराब हो जाते हैं। स्कूली बच्चे तैयार होकर निकलते हैं, लेकिन आधे रास्ते में कीचड़ से सने हुए लौटते हैं। गाड़ियां आधी सड़क में धंस जाती हैं, लोग गिरते हैं, घायल होते हैं। हर दिन कोई न कोई हादसा होता है।”
उन्होंने एक ताज़ा हादसे का ज़िक्र करते हुए बताया कि कुछ दिन पहले एक ऑटो पलट गया, जिसमें एक गर्भवती महिला सवार थी। सौभाग्य से जान बच गई, लेकिन यह कोई पहला हादसा नहीं था।
“पिछले साल चार बच्चों की मौत इसी सड़क पर हो चुकी है। बारिश में जब पानी भर गया था, बच्चे स्कूल से लौटते वक्त गिर गए और उनकी जान चली गई।”
मनीष का कहना है कि अगर सड़क के साथ नाली बनी होती, तो यह हादसे नहीं होते।
“बरसात का पानी सड़क पर नहीं चढ़ता, बल्कि नालियों में बह जाता। लेकिन यहां नाली का नामोनिशान नहीं है।”
💧 बरसाती पानी से घरों में तबाही
ग्राम के व्यापारी राजकुमार गुप्ता बताते हैं —
“नाली नहीं है, इसलिए हर बरसात में पानी घरों में घुस जाता है। दो बार तो हमारे घर में भी पानी भर चुका है। सामान खराब हो गया, दीवारें तक गिरने लगीं। अधिकारी रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन आंखें मूंदे रहते हैं।”
उन्होंने कहा कि विधायक जी एक बार आए थे, थोड़ी गिट्टी गिरवाई और फोटो खिंचवाकर चले गए।
“उसके बाद आज तक कोई देखने नहीं आया। लगता है जैसे ये सड़क उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। गाड़ियां खराब हो रही हैं, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे, किसान अपनी उपज मंडी नहीं ले जा पा रहे, लेकिन शासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।”
🚑 एम्बुलेंस तक नहीं निकल पाती
ग्रामवासी बताते हैं कि सड़क की हालत इतनी दयनीय है कि एंबुलेंस तक इस रास्ते से नहीं निकल पाती।
“कई बार मरीजों को खाट पर उठाकर सड़क के उस पार ले जाना पड़ता है ताकि वहां से कोई वाहन उन्हें आगे ले जाए। कई बार तो एंबुलेंस बीच रास्ते में फंस जाती है। यह सड़क नहीं, मौत का कुंआ बन चुकी है।”
रोज कोई न कोई गिरता है, चोटिल होता है। ग्रामीण ही उनकी मदद करते हैं — पानी लाते हैं, पट्टी करते हैं। पर सरकार और प्रशासन के लिए यह सब सामान्य घटनाएं बन चुकी हैं।
💸 सड़क से ठप हुआ गांव का आर्थिक जीवन
विनोद कुमार विश्वकर्मा, जो स्थानीय व्यवसायी हैं, बताते हैं —
“सड़क खराब होने से गांव का आर्थिक जीवन ठप पड़ गया है। ग्राहक बाजार नहीं आते, किसान मंडी नहीं जा पाते। ट्रैक्टर और मालवाहक गाड़ियां फंस जाती हैं। इससे ग्रामीणों की आमदनी पर सीधा असर पड़ा है।”
उन्होंने कहा कि अधिकारी बजट का बहाना बनाते हैं, पर असलियत यह है कि इच्छाशक्ति की कमी है।
“अगर शहर में यह सड़क होती, तो तीन दिन में बन जाती। लेकिन यह गांव है, इसलिए सब अनसुना रह जाता है। यहां की जनता की आवाज किसी फाइल में दबकर रह जाती है।”
🧾 शिकायतें हुईं, समाधान नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि कई बार सीएम हेल्पलाइन 181 में शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। शिकायतें निराकरण के नाम पर बंद कर दी जाती हैं।
“कागजों में समाधान दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं होता। अधिकारी फोन करके पूछ लेते हैं कि ‘काम हो गया क्या’, और फिर फाइल बंद कर देते हैं।”
⚠️ अब जनता की चेतावनी — “सड़क नहीं बनी तो चुनाव का बहिष्कार”
गढ़ के ग्रामीण अब सब्र की सीमा पार कर चुके हैं। उनका कहना है कि अगर इस बार भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो वे आगामी चुनाव में मतदान का बहिष्कार करेंगे।
“हम वादे नहीं, काम चाहते हैं। अगर सड़क और नाली नहीं बनी, तो इस बार कोई नेता गांव में कदम नहीं रख पाएगा।”
ग्रामीणों की सामूहिक मांग है —
1. आरसीसी रोड (सीमेंटेड सड़क) का निर्माण तत्काल किया जाए।
2. सड़क के दोनों ओर नालियों का निर्माण हो ताकि जलभराव न हो।
3. बीते वर्षों में हुई दुर्घटनाओं की जांच कर पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए।
4. सड़क निर्माण में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई की जाए।
5. सड़क के रखरखाव के लिए स्थायी मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया जाए।
📣 “अब कार्रवाई नहीं हुई, तो सड़क नहीं बल्कि आंदोलन बनेगा”
ग्रामवासियों का कहना है कि वे अब शांत नहीं बैठेंगे।
“अबकी बार अगर कार्रवाई नहीं हुई तो सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करेंगे। मीडिया को साथ लेकर आवाज उठाएंगे, ताकि प्रदेश स्तर पर यह मामला पहुंचे।”
गांव के बुजुर्गों से लेकर युवा तक अब एक ही सुर में बोल रहे हैं —
“यह सिर्फ सड़क की बात नहीं, हमारी ज़िंदगी की बात है। हम वोट देने वाले हैं, टैक्स देने वाले हैं, तो हमें सुविधा क्यों नहीं?”
गढ़ की सड़क विकास की सच्चाई बयां करती है
गढ़ की यह सड़क सिर्फ मिट्टी और डामर की नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और नेताओं के वादों की सच्चाई की सड़क है।
यह हमें याद दिलाती है कि विकास के नारों के पीछे कितनी अधूरी कहानियां दबी हैं। सड़कें जहां होनी चाहिए, वहां कीचड़ है; जहां पुल होना चाहिए, वहां पानी है; और जहां जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहां सिर्फ बयानबाजी है।
गढ़ की जनता अब जाग चुकी है। वे जानते हैं कि अब “फोटो खिंचवाने वाले वादे” नहीं, बल्कि जमीन पर काम चाहिए।
अगर शासन और प्रशासन ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, तो यह सड़क गढ़ से निकलकर पूरे प्रदेश में व्यवस्था की पोल खोलने वाली मिसाल बन जाएगी।
🛑 गढ़ की जनता की अंतिम अपील —
“हमें सिर्फ सड़क नहीं चाहिए, इंसाफ चाहिए। हमें नाली, रोशनी और सुरक्षा चाहिए। हर बरसात हमारे जख्म हरे कर देती है। अब वक्त है कि शासन हमारी सड़कों पर कदम रखे, फाइलों पर नहीं।”


