📰 पहले खाद की मार, अब बेमौसम बरसात की मार — टूटी किसानों की कमर, सरकार से राहत की आस
अन्नदाता की ज़िंदगी अब सिर्फ खेत-खलिहान तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अब संघर्ष और सब्र का दूसरा नाम बन चुकी है। कभी खाद की किल्लत, तो कभी बीज की समस्या, कभी बरसात की तबाही तो कभी मंडियों में औने-पौने दाम — हर मोर्चे पर किसान ही पिसता नज़र आता है। रीवा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों किसानों की हालत बदहाली की दास्तान कह रही है।
पहले खाद की भारी कमी ने बोआई की लय तोड़ी, और अब बेमौसम बारिश ने मेहनत की पूरी कमाई बहा दी। खेतों में लगी फसलें या तो सड़ चुकी हैं या कटाई से पहले ही धराशायी हो गई हैं।
🌾 खाद की किल्लत से शुरू हुआ संकट
अक्टूबर की शुरुआत में रबी फसलों की तैयारी पूरे जोरों पर थी। किसान उम्मीद में थे कि इस बार मौसम साथ देगा और पैदावार अच्छी होगी। मगर जैसे ही खेतों में खाद डालने का समय आया, सरकारी गोदामों और सहकारी समितियों में खाद का संकट गहराने लगा।
जनपद पंचायत गंगेव, हनुमना, मनगवां, नईगड़ी, रायपुर कर्चुलियान और सिरमौर क्षेत्रों में किसानों की लंबी-लंबी लाइनें समितियों के बाहर लग गईं। कई किसानों ने बताया कि घंटों इंतज़ार के बाद भी उन्हें खाद नहीं मिली।
मजबूरी में कई किसानों को निजी दुकानों से यूरिया और डीएपी महंगे दामों पर खरीदनी पड़ी।
किसान का कहना है —
“हमारी खेती पहले ही घाटे में चल रही है। अब खाद की कमी ने फसल की शुरुआत ही कमजोर कर दी। सरकार दावे तो करती है, पर खेत में हकीकत कुछ और होती है।”
कृषि विभाग ने आपूर्ति नियमित होने के दावे किए, लेकिन जमीनी तस्वीर उलटी थी। ट्रक आते ही किसानों की भीड़ उमड़ पड़ी और कुछ ही घंटों में पूरा स्टॉक गायब हो गया।
☔ अब बेमौसम बरसात ने दी दूसरी मार
जब किसानों ने किसी तरह खाद की व्यवस्था कर ली और फसलें लहलहाने लगीं, तभी आसमान से आफ़त बरस पड़ी। बेमौसम बारिश ने पूरे रीवा जिले में कहर मचा दिया।
धान की फसल कटाई के लिए तैयार थी, लेकिन अचानक हुई तेज़ बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
कई गांवों में खेतों में पानी भर गया, जिससे फसलें सड़ने लगीं। कटे हुए धान के ढेर मंडियों तक पहुँचने से पहले ही खराब हो गए।
“हमने पूरी मेहनत से फसल उगाई थी। अब बारिश ने सब चौपट कर दिया। पहले खाद नहीं मिली, अब फसल बर्बाद हो गई। अगर सरकार मदद नहीं करेगी तो हम कैसे जियेंगे?” — एक किसान की व्यथा
जिले के लगभग हर ब्लॉक — गंगेव, मनगवां, हनुमना से लेकर रायपुर कर्चुलियान तक — से किसानों ने यही दर्द बयां किया है। खेतों में पानी भरा है, फसलें गिरी पड़ी हैं, और कटाई का खर्च तक नहीं निकल पाएगा।
🚜 प्रशासन और बीमा योजनाओं पर सवाल
हर बार की तरह इस बार भी प्रशासन ने सर्वे की बात कही है, मगर किसानों को भरोसा नहीं।
बीमा योजना इतनी जटिल है कि छोटे किसान उसका लाभ ही नहीं उठा पाते। कई बार बीमा की राशि वर्षों बाद आती है या नाम गलत दर्ज होने के कारण किसान उससे वंचित रह जाते हैं।
यह सवाल अब बड़ा हो गया है —
जब सरकार किसानों को “अन्नदाता” कहती है, तो क्या उनकी तकलीफ़ें केवल कागज़ों और बैठकों तक सीमित रहनी चाहिए?
🗣️ जनता की पुकार — “वादा नहीं, व्यवस्था चाहिए”
गांवों में अब किसानों का सब्र जवाब दे रहा है। लोग कह रहे हैं —
“केवल भाषणों और आश्वासनों से पेट नहीं भरता। हमें ज़मीनी सहायता चाहिए।”
सरकार अगर सच में “कृषि प्रधान देश” के नारे पर अमल करना चाहती है, तो उसे किसानों के साथ धरातल पर खड़ा होना होगा —
चाहे वह खाद वितरण की गड़बड़ी हो, फसल बीमा की जटिलता, या फिर बेमौसम बरसात से हुए नुकसान की भरपाई।
🌱 उम्मीद की किरण
रीवा और आसपास के किसान अब प्रशासन की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। उन्हें उम्मीद है कि जल्द सर्वे कराकर उचित मुआवज़ा दिया जाएगा।
क्योंकि अगर किसान टूटा —
तो सिर्फ एक खेत नहीं, बल्कि देश की रीढ़ भी कमजोर पड़ जाएगी।





