📰 मनगवा विधानसभा: आरक्षित है, लेकिन अशिक्षित नहीं — विकास की राह अब भी अधूरी
मनगवा विधानसभा क्षेत्र की गाथा आज उस विडंबना को उजागर करती है, जो आरक्षण और अशिक्षा के नाम पर विकास से दूरी का प्रतीक बन चुकी है।
"हम अशिक्षित हैं, हम आरक्षित हैं — इसका मतलब यह नहीं कि हमें विकास से दूर रखा जाए" — यह आवाज अब मनगवा के कोने-कोने से उठ रही है।
पिछले लगभग 20 वर्षों से आरक्षित यह विधानसभा क्षेत्र अपने ही भाग्य पर आंसू बहा रहा है। समय बीतता गया, सरकारें बदलीं, विधायक बदले, लेकिन विकास वहीं का वहीं ठहर गया। आज भी मनगवा की तस्वीर 25 साल पुरानी लगती है, जहां सड़क, नाली और बुनियादी ढांचे की हालत ज्यों की त्यों बनी हुई है।
🔹 राष्ट्रीय राजमार्ग का असमान विकास
केंद्र सरकार द्वारा जब रीवा-गुढ़-मनगवा-देवतालाब-मऊगंज मार्ग पर राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण हुआ, तो सभी विधानसभा क्षेत्रों में बाईपास और सीमेंटेड सड़कें बन गईं।
रीवा, देवतालाब और मऊगंज की सड़कों पर विकास की रफ्तार साफ दिखाई देती है। लेकिन मनगवा का गढ़ क्षेत्र आज भी गड्ढों में तब्दील सड़कों के साथ अपने प्रतिनिधियों की उम्मीद लगाए बैठा है।
पूर्व विधायक पंचूलाल प्रजापति ने इस मार्ग और नाली निर्माण के लिए कई बार पहल की, लेकिन उनका प्रयास अधूरा रह गया। वहीं वर्तमान विधायक इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति ने भी बार-बार अधिकारियों और संबंधित विभागों को सड़क सुधार की मांग रखी, किंतु प्रशासनिक उदासीनता अब तक बरकरार है।
🔹 “पढ़ा-लिखा होना पाप नहीं”
स्थानीय चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि “पढ़ा-लिखा होना अगर अपराध है, तो विकास से वंचित रहना हमारी सजा है।”
लोगों का मानना है कि आरक्षण का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि क्षेत्र को विकास से वंचित कर दिया जाए। जहां अन्य विधानसभा क्षेत्रों में करोड़ों के प्रोजेक्ट धरातल पर दिखते हैं, वहीं मनगवा आज भी अधूरे वादों और खोखले दावों के बीच फंसा हुआ है।
🔹 मऊगंज से तुलना में हताशा
स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब मऊगंज क्षेत्र में विकास कार्यों में देरी होती है, तो वहां के जनप्रतिनिधि धरना-प्रदर्शन तक करने से पीछे नहीं हटते।
लेकिन मनगवा क्षेत्र में मर्यादा और संयम को कमजोरी समझा जा रहा है। एक स्थानीय कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —
“मर्यादा का मतलब यह नहीं कि हम संघर्ष नहीं जानते। अगर सड़क निर्माण जल्द पूरा नहीं हुआ, तो जनआंदोलन ही अंतिम रास्ता होगा।”
🔹 राजनीतिक असमानता और सवाल
वर्तमान में रीवा जिले की दो विधानसभा — रीवा और देवतालाब — में करोड़ों रुपए के विकास कार्य चल रहे हैं।
देवतालाब में लगभग 500 करोड़ रुपए से अधिक की सड़क और पुल निर्माण परियोजनाएं चल रही हैं। लेकिन मनगवा क्षेत्र की सड़कों की हालत इतनी खराब है कि ग्रामीण अब इन्हें “आंसू बहाती सड़कें” कहने लगे हैं।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रशासन और संगठन के शीर्ष अधिकारी यह भूल गए हैं कि मनगवा भी रीवा जिले का हिस्सा है?
आरक्षित होने का मतलब यह नहीं कि मनगवा क्षेत्र को हाशिए पर धकेल दिया जाए
🔹 “मनगवा आरक्षित है, लेकिन अशिक्षित नहीं”
यह वाक्य अब पूरे क्षेत्र की पहचान बन गया है।
पांच-पांच विधायकों को देने वाले इस क्षेत्र का दुर्भाग्य यह है कि आज भी यह बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
लोग तंज कसते हैं —
“दुर्भाग्य उस मां का, जिसकी कोख से ऐसी संतानें पैदा हुईं, जो अपने ही घर को रोशनी तक नहीं दे पाईं।”
🔹 जनता की अंतिम उम्मीद
मनगवा की जनता अब विकास की राजनीति चाहती है, न कि वादों की।
यदि आने वाले महीनों में सड़क और नाली निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ, तो जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने तैयार है।
लोगों का कहना है —
“हमने सम्मान दिया, विश्वास किया, अब परिणाम चाहिए। मनगवा अब और नहीं रुकेगा।”
मनगवा विधानसभा आज एक सवाल है — क्या आरक्षण के नाम पर विकास का हक छीना जा सकता है?
अब यह क्षेत्र एक ही बात कह रहा है —
“हम आरक्षित हैं, लेकिन अशिक्षित नहीं — हमें भी विकास चाहिए, सम्मान चाहिए।”



