गढ़ की सड़क की दुर्दशा: गोली के घाव गोबर से नहीं ढकते पुरानी राष्ट्रीय राजमार्ग-27 अब बन चुकी जर्जरता की मिसाल
कहावत है—“गोली के घाव गोबर से नहीं ढकते।” यह कहावत आज रीवा जिले के गढ़ क्षेत्र की सड़कों पर अक्षरशः चरितार्थ होती नजर आ रही है। कभी राष्ट्रीय राजमार्ग-27 का गौरव रखने वाली यह सड़क अब गड्ढों और जलभराव की ऐसी मिसाल बन चुकी है कि लोग सड़क पर चलने से डरते हैं। वर्षों से मरम्मत के नाम पर गिट्टी डालने और पैचिंग करने की रस्म निभाई जा रही है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
गढ़ बाजार से गुजरने वाली यह पुरानी एनएच-27 अब स्थानीय लोगों की परेशानियों का केंद्र बन चुकी है। पुरानी बस्ती के रहवासियों द्वारा नईगढ़ी मोड़ की नाली से मुख्य सड़क तक बहता पानी, वाहनों के धुलाई सेंटर का पानी, साथ ही सैकड़ों घरों का गंदा पानी मुख्य सड़क तक हजारों लीटर रोजाना बहाया जाता है, जिसकी वजह से अब सड़क का नामोनिशान मिट चुका है। ग्रामीणों और व्यापारियों का कहना है कि “सिर्फ दिखावे की मरम्मत से कुछ नहीं होगा, हमें स्थायी समाधान चाहिए।”
लगातार प्रकाशित हो रही थी खबरें, विधायक ने लिखा पत्र
पिछले 10 दिनों से लगातार प्रमुखता के साथ विंध्य वसुंधरा समाचार इस सड़क को लेकर खबर दिखा रहा है। इसके साथ ही अन्य स्थानीय चैनलों और अखबारों ने भी प्रमुखता से राष्ट्रीय राजमार्ग 27 की खराब हालत को दिखाया था।
उसके बावजूद मंत्री, विधायक को तो छोड़िए गढ़ के सरपंच, सचिव, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य या अन्य जनप्रतिनिधि... जिनका इस सड़क से रोजाना आना जाना रहता है, उन पर भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा। सभी सत्ता के नशे में चूर हैं, उनकी आंखों में पट्टी बंधी हुई है।
गढ़ की सड़क की खस्ता हालत को लेकर पिछले कई दिनों से समाचार पत्रों में लगातार खबरें प्रकाशित हो रही थीं। स्थिति इतनी बदतर हो गई कि क्षेत्रीय विधायक मनगवां इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने रीवा कलेक्टर को पत्र लिखकर सड़क के निर्माण की मांग की।
पत्र के बाद प्रशासनिक अमले ने हलचल तो दिखाई — कुछ गड्ढों में गिट्टी डलकर “काम शुरू” किया लेकिन
ग्रामीणों का कहना है कि “हर साल यही कहानी दोहराई जाती है — थोड़ी गिट्टी डाल दी जाती है, फोटो खिंचवा ली जाती है, और फिर काम खत्म।”
ग्रामीणों और व्यापारियों की पीड़ा — “सड़क नहीं, तालाब बन जाती है”
गढ़ बाजार की लगभग तीन किलोमीटर सड़क पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। यह वही रास्ता है जो पहले रीवा-सतना मार्ग का मुख्य हिस्सा था। बाईपास बनने के बाद से इस पुराने मार्ग की उपेक्षा शुरू हो गई। अब स्थिति यह है कि गड्ढों में घुटनों तक पानी भर जाता है।
स्थानीय दुकानदार सत्यराज गोस्वामी कहते हैं —
“मेरी गढ़ बाजार में दुकान है। जब से बाईपास बना है, तब से यह रोड भगवान भरोसे है। तीन किलोमीटर तक पूरा रास्ता टूटा हुआ है। हर दो साल में एक बार थोड़ी-बहुत पैचिंग होती है, लेकिन कभी पूरी सड़क नहीं बनी। गड्ढों में पानी भर जाता है, जिससे सड़क और खराब हो जाती है। सबसे बड़ी समस्या है कि यहां आज तक नाली नहीं बनी। अगर नाली बन जाए तो पानी निकल जाएगा और सड़क खराब नहीं होगी।”
सत्यराज बताते हैं कि सुबह से सड़क पर गिट्टी डाली गई थी, लेकिन दोपहर तक कोई देखने तक नहीं आया। उन्होंने कहा —
“यहां की हालत यह है कि गाड़ियां पंक्चर हो जाती हैं, ग्राहक रुकते नहीं, व्यापार ठप हो गया है। आसपास की सभी जगहों की सड़कें बन गईं — रघुनाथगंज, देवतलाब, मनगवां, रायपुर, गंगेव — सिर्फ गढ़ ही पिछड़ा रह गया है। विधायक आते हैं, वादे करते हैं, फिर चले जाते हैं। कोई असर नहीं।”
“पैचिंग से नहीं बनेगी बात” — स्थानीय युवाओं की राय
दुकानदार अंकित सिंह का कहना है —
“गढ़ बाजार की लगभग पांच सौ मीटर सड़क तो पूरी तरह से दलदल बन चुकी है। हर साल गिट्टी डालते हैं, लेकिन दो महीने में फिर वही हाल। यह पैचिंग स्थायी समाधान नहीं है। जब तक पक्की नालियां नहीं बनेंगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। हर बार ठेकेदार गिट्टी डालकर चला जाता है और पैसा वसूल लेता है।”
अंकित आगे कहते हैं कि बाजार के दोनों ओर की नालियां सबसे पहले बननी चाहिए। बिना जलनिकासी के कोई भी सड़क ज्यादा दिन नहीं टिक सकती। “यहां हर बारिश में सड़क पर पानी जमा रहता है, जिससे दुकानों में भी पानी भर जाता है।”
काग्रेस मंडल अध्यक्ष ने जताई चिंता
गढ़ कांग्रेस मंडल अध्यक्ष अच्छे खान ने सड़क की स्थिति को “जनता के साथ अन्याय” बताया। उन्होंने कहा —
“गढ़ की सड़क की हालत देखकर किसी को भी शर्म आ जाए। गढ़ लोरी मोड़ से लेकर चंदनबाग तक रोड नाम की चीज नहीं बची है। हर तरफ गड्ढे और कीचड़ हैं। घुटने तक पानी भर जाता है। हमने इस मामले में कई बार अधिकारियों को अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। रविवार को हम लोग बड़ी संख्या में तहसीलदार और एसडीएम को ज्ञापन सौंपेंगे। अगर काम नहीं हुआ तो आंदोलन करेंगे।”
खान का कहना है कि “गढ़ बाजार में व्यापार चौपट हो रहा है, किसानों और छात्रों को भी परेशानी है। जब शासन जनता की बुनियादी जरूरत — सड़क — ही पूरी नहीं कर सकता तो विकास की बातें बेमानी लगती हैं।”
स्थानीय लोगों के सवाल — क्या जिम्मेदारों को जनता की तकलीफ दिखती नहीं?
लोगों का कहना है कि हर साल सड़कों के नाम पर भारी रकम खर्च दिखाई जाती है, लेकिन सड़क की हालत जस की तस रहती है। यह सवाल अब जनता खुलकर पूछ रही है
“क्या जिम्मेदार अधिकारियों को गढ़ की जनता की तकलीफ दिखाई नहीं देती? आखिर किस आधार पर सड़कों के रखरखाव की राशि खर्च हो रही है?
वास्तविकता यह है कि सड़क मरम्मत में गुणवत्ता की कोई निगरानी नहीं होती। काम के बाद निरीक्षण भी औपचारिकता बनकर रह गया है।
“गोली के घाव गोबर से नहीं ढकते” — कहावत का सच
गढ़ की यह कहानी उस कहावत को जीवंत कर रही है — “गोली के घाव गोबर से नहीं ढकते।”
जिस तरह गहरे जख्म को सतही मरहम से नहीं भरा जा सकता, वैसे ही गड्ढों में गिट्टी डालना स्थायी सड़क निर्माण का विकल्प नहीं है।
गिट्टी डालने से दो दिन के लिए धूल कम हो सकती है, लेकिन पहली ही बारिश में सड़क फिर बिखर जाती है।
नाली के अभाव में पानी सड़क को और कमजोर कर देता है।
जब तक पूरी योजना के तहत पीसीसी सड़क और पक्की नालियां नहीं बनेंगी, तब तक यह समस्या बार-बार सिर उठाती रहेगी।
गढ़ की जनता अब तात्कालिक उपाय नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहती है।
सड़क से जुड़ी आर्थिक-सामाजिक समस्या
यह सिर्फ सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि गढ़ के आर्थिक और सामाजिक जीवन से जुड़ा सवाल है।
बाजार में ग्राहकों की आवाजाही कम हो गई है, जिससे व्यापारियों का नुकसान हो रहा है।
वाहन पंचर होने, फिसलने और दुर्घटनाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं।
दुकानों में पानी घुसने से सामान खराब हो रहा है।
छात्र और कर्मचारी रोज़ाना इस रास्ते से गुजरते हैं, उन्हें भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
व्यापारियों का कहना है कि यदि यह स्थिति बनी रही तो कई दुकानें बंद करनी पड़ेंगी। “हम टैक्स भरते हैं, लेकिन बदले में हमें सिर्फ गड्ढे और कीचड़ मिलते हैं,” दुकानदारों का व्यंग्यात्मक जवाब है।
प्रशासनिक लापरवाही या ठेकेदारी का खेल?
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि हर बार मरम्मत के नाम पर भारी रकम खर्च दिखाई जाती है, पर जमीन पर उसका कोई असर नहीं दिखता।
“यहां ठेकेदार गिट्टी डालकर चला जाता है, अधिकारी दिखावे के लिए निरीक्षण कर लेते हैं, और फिर वही कहानी अगले साल दोहराई जाती है,” लोगों का कहना है।
सूत्र बताते हैं कि इस सड़क का कार्य-दायित्व लोक निर्माण विभाग (PWD) और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के बीच समन्वय की कमी के कारण अटका हुआ है। यही कारण है कि मरम्मत कार्य अधूरा रहता है और जवाबदेही तय नहीं हो पाती।
स्थानीय मांगें — “स्थायी निर्माण ही एकमात्र समाधान”
गढ़ क्षेत्र के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने शासन-प्रशासन से निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं:
1. गढ़ बाजार की तीन किलोमीटर सड़क का पूर्ण पुनर्निर्माण किया जाए।
2. दोनों ओर पक्की नालियां बनाई जाएं, ताकि जलभराव की समस्या समाप्त हो।
3. सड़क निर्माण में गुणवत्ता की जांच के लिए स्वतंत्र टीम गठित की जाए।
4. ठेकेदार और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
5. स्थानीय व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों को निरीक्षण में शामिल किया जाए।
6. सड़क का स्थायी रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
विधायक और प्रशासन से जनता की अपील
गढ़ की जनता अब वादे नहीं, कार्य चाहती है। लोगों का कहना है कि विधायक और प्रशासन को अब “कागज़ी पत्राचार” से आगे बढ़कर ज़मीन पर काम करना चाहिए।
विधायक नरेंद्र प्रजापति द्वारा कलेक्टर को पत्र लिखना सराहनीय पहल थी, लेकिन जनता कहती है कि “अब परिणाम चाहिए, न कि बयान।”
स्थानीय बुजुर्ग कहते हैं — “पहले सड़क से पहचान थी, अब सड़क से परेशानी है।”
गढ़ की सड़क गवाही दे रही है
गढ़ की सड़कें सिर्फ गड्ढों से नहीं भरी हैं, बल्कि उनमें लोगों की उम्मीदें, विश्वास और विकास की चाह दबी हुई है।
जब हर बारिश में सड़क तालाब बन जाती है, जब हर वाहन पंचर होता है, जब हर दुकानदार का धंधा चौपट होता है — तब यह केवल सड़क की बात नहीं रह जाती, यह प्रशासनिक जिम्मेदारी का प्रश्न बन जाता है।
गढ़ के लोग अब कहते हैं —
“अब गोबर से घाव नहीं ढकेंगे, हमें स्थायी इलाज चाहिए।”
सरकार और संबंधित विभागों को चाहिए कि इस मुद्दे को गंभीरता से लें और जल्द से जल्द गढ़ बाजार की तीन किलोमीटर सड़क को पक्की नालियों सहित नए सिरे से बनाया जाए। यही वह समाधान है जिससे जनता का भरोसा लौटेगा, व्यापार फिर से जीवंत होगा, और गढ़ की पहचान फिर से “गढ़” जैसी मजबूत बनेगी।



