रीवा–मऊगंज में सरकारी भूमि पर बढ़ रही कब्जेदारी सत्ता–अफसर गठजोड़ और विभागीय उदासीनता से खो रही संस्थाओं की जमीनें
मध्य प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में सत्ता और सट्टा तंत्र के गठजोड़ से सरकारी एवं संस्थागत भूमि पर कब्जे की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों, प्रभावशाली लोगों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ के कारण कई विभाग अपनी ही दर्ज जमीनों को बचाने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। स्थिति यह है कि राजस्व और सिविल न्यायालयों में विभागों द्वारा समय पर मुकदमे नहीं लड़े जाते, न ही वरिष्ठ अधिकारियों से वैधानिक अनुमति लेकर विवादों को सुलझाने की कोशिश की जाती है। परिणामस्वरूप, सार्वजनिक भूमि पर निजी कब्जा, अतिक्रमण और रिकॉर्ड में हेराफेरी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
रीवा संभाग में अनेक संस्थाओं की जमीनें निजी हाथों में गईं
रीवा जिले में शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग, राजस्व विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग तथा पंचायतों के अंतर्गत आने वाली कई भूमि वर्षों से विवादों में पड़ी रही। विभागीय उदासीनता और मिलीभगत के कारण कई महत्वपूर्ण स्थल निजी हाथों में पहुंच गए।
सबसे बड़ा उदाहरण रीवा का प्रमुख बस स्टैंड है, जो शासन की संपत्ति होते हुए भी सत्ता–अधिकारी गठजोड़ के चलते निजी व्यक्तियों के कब्जे में चला गया। आज स्थिति यह है कि बस स्टैंड में ठेला–दुकान, वाहन पार्किंग और अन्य वसूली पर निजी लोगों का सीधा अधिकार है और इससे उन्हें करोड़ों रुपये की आमदनी हो रही है।
सामाजिक संगठनों, समाजसेवियों और विपक्षी दलों की कमजोर भूमिका भी इस अवैध कब्जेदारी के विस्तार का कारण मानी जा रही है।
ग्राम पंचायत गढ़: संस्थाओं की जमीन रिकॉर्ड से गायब
ताजा मामला ग्राम पंचायत गढ़, जनपद पंचायत मनगवा, जिला रीवा का है, जहां शिक्षा विभाग, थाना, आयुर्वेद औषधालय, प्राथमिक पाठशाला तथा पशु औषधालय की भूमि में गंभीर स्तर पर रिकॉर्ड हेराफेरी सामने आई है।
बालक हायर सेकेंडरी स्कूल/प्रयोगशाला की 56 डिसमिल भूमि को रिकॉर्ड में बदलकर 6 डिसमिल कर दिया गया।
भूमि क्रमांक 77, जो थाना और बालक हायर सेकेंडरी स्कूल की संयुक्त लगभग ढाई एकड़ जमीन थी, वह भी रिकॉर्ड में गायब कर दी गई।
थाना परिसर, पुलिस क्वार्टर और खेल मैदान की भूमि भी खसरे के कंप्यूटरीकरण के दौरान 2000 के बाद से विलुप्त हो गई है।
आश्चर्यजनक रूप से कई स्थानों पर शासकीय भूमि को धार्मिक स्थल, कबीले कास्ट/जाति श्रेणी अथवा अज्ञात व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया गया।
स्थानीय ग्रामीणों का सवाल है कि स्कूल की भूमि पर धार्मिक स्थल कैसे दर्ज किया गया? किसे लीज़ दी गई? इन सभी मामलों में विभाग प्रमुखों की अनुपस्थिति और निष्क्रियता कई संदेह पैदा करती है।
स्कूल की जमीन पर निजी व्यक्तियों के नाम
बालक हायर सेकेंडरी स्कूल की भूमि नंबर 51, जिसका क्षेत्रफल लगभग 1 एकड़ 25 डिसमिल है, नक्शे–खसरे में आज भी शासकीय दर्शाई गई है।
लेकिन खसरे में कई अन्य निजी व्यक्तियों और संस्थाओं के नाम दर्ज हो चुके हैं। जमीन रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में बड़े अंतर की वजह से राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर कई प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
अब लड़ाई हाई कोर्ट तक जाएगी
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्कूल संगठन से जुड़े लोगों ने अब इस मामले को जबलपुर हाई कोर्ट में ले जाने की तैयारी शुरू कर दी है।
याचिका में संबंधित विभागाध्यक्षों, जनप्रतिनिधियों (विधायक–सांसद), पंचायत पदाधिकारियों तथा राजस्व अधिकारियों को पक्षकार बनाया जाएगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि—
“जनप्रतिनिधि विकास योजनाएँ उन्हीं स्थानों पर बनवाते हैं जहाँ बिक्री, बोली या निजी लाभ की संभावना अधिक हो। संस्थाओं के विकास की योजनाएँ तो वर्षों से प्रस्तावित ही नहीं होतीं।”
हाट–बाजार निर्माण में भी बड़े सवाल
ग्राम पंचायत गढ़ में हाट–बाजार निर्माण को लेकर भी गंभीर आरोप लगे हैं—
बाजार तीन–तीन बार बनवाए गए, परंतु निर्माण अधूरा रहते ही दुकानों को लोगों को सौंप दिया गया।
कई स्थानों पर दीवार उठाकर लोग निजी कब्जा कर चुके हैं।
पंचायत भवन के पास बने बाजारों में बोली, भूमि आवंटन और निर्माण प्रक्रिया पर गंभीर अनियमितताएँ बताई जा रही हैं।
25 वर्ष से कुछ भवन बिना किवाड़–खिड़की और छत के अधूरे पड़े हुए हैं, पर जांच कभी नहीं हुई।
ग्रामीण बोले—“अब यह लड़ाई आसान नहीं”
स्थानीय लोगों का कहना है कि—
