अवैध आय में भयावह वृद्धि: सत्ता, नौकरशाही और कारोबार से जुड़े तबकों पर उठते सवाल
देश में सत्ता से जुड़े नेताओं, नौकरशाहों और प्रभावशाली व्यवसाइयों की आय में अचानक और अप्राकृतिक रूप से हुई चौंकाने वाली वृद्धि अब समाज में आम चर्चा का विषय बन चुकी है। यह मुद्दा नया नहीं है, लेकिन पिछले दो दशकों में इसकी तीव्रता ने गंभीर चिंताएँ खड़ी कर दी हैं।
2004 से पहले और बाद की स्थिति
सन 2004 से पहले राजनीतिक दलों के साधारण कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और कुछ अधिकारी सीमित साधनों के साथ जीवन व्यतीत करते थे। उनकी आय बढ़ने की गति ऐसी थी जिसका आकलन किया जा सकता था।
लेकिन 2004 के बाद स्थिति में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला। चाहे कोई जनप्रतिनिधि ग्राम पंचायत का हो, जिला पंचायत, विधानसभा, लोकसभा या किसी भी संवैधानिक इकाई का—करीब 90 प्रतिशत लोगों की आय में असामान्य व भयावह वृद्धि दर्ज की गई।
किन विभागों में आय वृद्धि पर सबसे ज्यादा सवाल
ठेकेदारी व निर्माण से जुड़ा वर्ग
ट्रांसपोर्ट एवं परिवहन विभाग
आबकारी विभाग
खनिज विभाग
राजस्व व रजिस्ट्री विभाग
सहकारिता विभाग
पुलिस विभाग
शासकीय खरीद–फरोख्त एवं आपूर्ति से जुड़े कर्मचारी
इन क्षेत्रों से जुड़े लोगों की संपत्ति में इतनी तेजी से बढ़ोतरी हुई कि जिन लोगों के पास कभी रहने को घर, चलने को मोटरसाइकिल और भोजन बनाने तक की व्यवस्था नहीं थी—आज वे करोड़ों ही नहीं, बल्कि अरबों की संपत्ति के मालिक बन चुके हैं। परिवारजन, रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर की गई अघोषित संपत्ति इसका सबसे बड़ा प्रमाण बन रही है।
आखिर कौन-सा व्यापार देता है इतनी कमाई?
सवाल यह उठता है कि आखिर देश में ऐसा कौन-सा व्यवसाय है जो कुछ ही वर्षों में किसी भी साधारण व्यक्ति को जमीन से उठाकर अरबपति बना दे?
यदि आय के स्रोत पारदर्शी होते, तो लोगों के मन में इतनी शंकाएँ न उठतीं। लेकिन आय और संपत्ति के बीच असंगति से यह साफ झलकता है कि
कहीं न कहीं भ्रष्टाचार, अवैध कारोबार और काले धन का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है।
भ्रष्टाचार और कालाबाजारी से समाज पर असर
समय पर बनने वाली परियोजनाएँ भ्रष्टाचार का शिकार होकर अधूरी रह जाती हैं
हर क्षेत्र में कालाबाजारी और अवैध व्यापार बढ़ रहा है
खाद्य सामग्री तक में मिलावट की होड़ मची है
मानवता को पैसों की भूख के आगे कुर्बान किया जा रहा है
लोग अपने घरों की तिजोरियों को भरने के लिए समाज की नैतिकता और मानवता को तार–तार कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल सामाजिक ढांचे को क्षतिग्रस्त करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी खतरे में डाल देती है।
प्रकृति पर भी गहराता संकट
केवल समाज ही नहीं, बल्कि प्रकृति भी इस लालच की शिकार हुई है—
नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है
पहाड़ों व भूमिगत संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया जा रहा है
खनन के कारण भूमि खोखली होती जा रही है
जलभराव, सूखा और प्राकृतिक आपदाएँ लगातार बढ़ रही हैं
जब मनुष्य प्रकृति से खिलवाड़ करेगा, तो प्रकृति भी उसे समय आने पर क्षमा नहीं करेगी।
समाज को चेतना की आवश्यकता
अब समय है कि समाज जागृत हो।
हमें यह समझना होगा कि धन का कोई भी असीम भंडार मानव जीवन का विकल्प नहीं हो सकता।
यदि मानव ही नहीं रहेगा तो सोना, चांदी, हीरे, जमीन और नोट किस काम आएँगे?
नैतिकता, ईमानदारी और मानवता की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
राजनैतिक और प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग समाज-निर्माण में होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत संपत्ति बनाने में।

