रीवा संभाग में नशीली कफ सिरप और प्रतिबंधित गोलियों का बढ़ता कारोबार: पुलिस कार्रवाई के बावजूद चिंताजनक हालात
रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा संभाग में नशीली कफ सिरप, प्रतिबंधित दवाइयों और नशीली गोलियों का अवैध कारोबार बेकाबू होता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से नशे का प्रसार बढ़ा है, उसने न केवल कानून-व्यवस्था, बल्कि सामाजिक ढांचे को भी हिला कर रख दिया है।
शहर से लेकर दूरस्थ ग्रामों तक युवाओं के हाथों में बोतलें और टैबलेट्स पहुंच जाना एक गहरी समस्या का संकेत है। स्थानीय पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है, परंतु सप्लाई चेन इतनी जटिल और संगठित हो चुकी है कि इसे पूर्णतः समाप्त कर पाना अब बेहद चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है।
अपराधों की जड़ में 'नशा', विवादों का 50% कारण यही
रीवा संभाग में होने वाली आपराधिक घटनाओं, सड़क विवादों, पारिवारिक झगड़ों और हिंसक संघर्षों में से लगभग 50 प्रतिशत मामलों की पृष्ठभूमि में नशा कारोबार या नशा सेवन सीधे तौर पर जुड़ा मिला है।
कई पुलिस केस स्टडी में खुलासा हुआ है कि—
छोटी-सी कहासुनी नशे में बढ़कर हिंसा में बदल जाती है।
किशोर और युवा, कफ सिरप व गोलियों के नशे में अपराध की ओर झुक रहे हैं।
कई गिरोह नशे की कमाई से ही आपराधिक गतिविधियों को संचालित कर रहे हैं।
IG गौरव सिंह राजपूत की सख्त नीति—स्पेशल टीमों की तैनाती
रीवा संभाग के आईजी गौरव सिंह राजपूत ने नशे के खिलाफ विशेष अभियान शुरू किया है।
जिलेभर में लगातार कास्ट्रेडिंग, छापेमारी, गश्त बढ़ाने और नशेबाजों की सूची तैयार करने जैसे कदम उठाए गए हैं।
सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि मेडिकल दुकानों की निगरानी बढ़ाएं, थोक विक्रेताओं का सत्यापन करें, और संदिग्ध युवाओं की गतिविधियों पर नजर रखें।
इसके बावजूद नशा कारोबारियों के तौर-तरीके पुलिस की बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ये गिरोह फोन पर नहीं, बल्कि कोडवर्ड और ऑफलाइन नेटवर्क से सप्लाई करते हैं, जिससे उन्हें पकड़ना कठिन हो जाता है।
कैसे फैल रहा है जहर? — पूरी सप्लाई चेन का काला सच
रीवा संभाग में नशीली कफ सिरप और टैबलेट्स के फैलाव की एक मजबूत, परंतु अवैध व्यवस्था वर्षों में तैयार हो गई है
1. मेडिकल दुकानों की भूमिका
कुछ मेडिकल स्टोर्स बिना डॉक्टर की पर्ची के कफ सिरप बेच देते हैं।
लाभ अधिक होने के कारण जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं।
यहीं से अवैध सप्लायरों को आसानी से स्टॉक मिलता है।
2. अंतर्राज्यीय तस्करी
उत्तर प्रदेश और बिहार से ट्रकों व प्राइवेट वाहनों के जरिए खेप रीवा तक पहुंचती है।
सीमा क्षेत्रों की निगरानी कमजोर होने का फायदा उठाया जाता है।
3. गांवों तक पहुंची 'मिनी सप्लाई चेन'
छोटे-छोटे गांवों में स्थानीय किशोर और बेरोजगार युवा कमीशन पर बोतलें व गोलियाँ बेचते हैं।
यह नेटवर्क पुलिस कार्रवाई के बाद भी जल्दी तैयार हो जाता है।
सामाजिक ढांचे पर भारी पड़ रहा है नशा
रीवा में नशे का असर केवल स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर दिखने लगा है—
युवाओं में शिक्षा छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी।
घर-परिवार में तनाव और घरेलू हिंसा के मामले बढ़े।
अवैध पैसों के चलते आपराधिक गिरोहों की ताकत बढ़ी।
छोटे कस्बों में चोरी और लूट जैसे अपराध बढ़ने लगे।
कई अभिभावक शिकायत कर चुके हैं कि उनके बच्चे बिना किसी कारण रात में घर से गायब रहते हैं और धीरे-धीरे नशे के शिकार हो रहे हैं।
पुलिस से अधिक जरूरी 'जन-जागरूकता' — विशेषज्ञों की राय
दवा विशेषज्ञों और समाजसेवियों का मानना है कि—
“जब तक समाज आगे नहीं आएगा, केवल पुलिस कार्रवाई से नशा खत्म नहीं होगा।"
स्कूल-कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान, पंचायतों में नशा विरोधी समितियाँ और मेडिकल दुकानों पर सख्त नियम ही इस संकट को कम कर सकते हैं।

