रीवा संभाग में मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ अनियमित स्कूल वाहन व्यवस्था का काला सच — जिम्मेदार कौन?
रीवा संभाग में शिक्षा का निजीकरण तेजी से बढ़ा है। शहरों की तरह अब गांवों में भी बड़ी संख्या में प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। लेकिन इन स्कूलों में पढ़ने जाने वाले बच्चों की सुरक्षा का हाल देखकर स्पष्ट लगता है कि विकास की रफ्तार के साथ-साथ लापरवाही भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ी है।
तीन पहिया और चार पहिया स्कूल वाहनों में जिस तरह मासूम बच्चों को ठूंस-ठूंसकर भरा जाता है, वह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि एक चलता-फिरता खतरा है। भीड़ भरी स्कूल वैनें सड़क पर तेज रफ्तार से दौड़ती हैं। कई बार वाहन अनियंत्रित होकर पलटने से बच्चों की जान पर बन आती है, लेकिन सौभाग्य से दुर्घटना टल जाती है। प्रशासन हर बार राहत की सांस लेता है, पर व्यवस्था में कोई सुधार नहीं होता।
अभिभावक, स्कूल संचालक और परिवहन विभाग — तीनों समान रूप से दोषी
बाल अधिकार आयोग ने साफ कहा है कि बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ के इस गंभीर मामले में —
अभिभावकों की लापरवाही,
स्कूल संचालकों की उदासीनता और
परिवहन विभाग की कमजोर निगरानी
तीनों बराबर जिम्मेदार हैं।
अभिभावक कहाँ चूक रहे हैं?
जिन बच्चों को माता-पिता ने प्यार से पाला, जिनकी सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास किए — वही बच्चे रोज़ ऐसे वाहनों में भेजे जा रहे हैं, जिन्हें देखकर कोई भी समझ सकता है कि यह वाहन किसी भी क्षण हादसे का कारण बन सकता है।
अभिभावक सिर्फ इस बात पर भरोसा कर लेते हैं कि वाहन स्कूल का है, पर यह नहीं देखते कि क्षमता 6 सीट की हो या 9 की — उसमें 15–20 बच्चे ठूंसे गए हैं।
स्कूल संचालक क्यों दोषी हैं?
कई प्राइवेट स्कूलों में न तो नियमित परिवहन समिति है, न ही वाहन सुरक्षा मापदंडों का पालन। ड्राइवरों की जांच तक नहीं होती। कई बार देखा गया है कि
बिना फिटनेस वाहन,
बिना परमिट वाहन,
बिना सीट बेल्ट और
बिना महिला अटेंडर
बच्चों को ले जा रहे होते हैं।
परिवहन विभाग की ढीली निगरानी
वाहनों की चेकिंग कागजों में ज्यादा और सड़कों पर कम दिखती है। साल में दो-चार बार औपचारिक जांच कर विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। जबकि असल में इन्हीं वाहनों के कारण सबसे ज्यादा हादसे का खतरा बना रहता है।
हादसा होते ही प्रशासन जागता है — फिर सब सामान्य
रीवा संभाग में जब भी कोई दुर्घटना होती है तो—
प्रशासन
सत्ता और विपक्ष
सामाजिक संगठन
बाल आयोग
तीन से दस दिन तक सक्रिय हो जाते हैं। बयानबाजी होती है, धरने और मीटिंगें होती हैं, कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन जैसे ही मामला शांत होता है—सारी व्यवस्था फिर अपनी पुरानी ढर्रे पर लौट आती है।
यही कारण है कि रीवा संभाग में ऐसा शायद ही कोई गांव होगा, जहाँ यह अव्यवस्था देखने को न मिलती हो।
समाधान क्या? कलेक्टर को जारी करने होंगे कड़े आदेश
समाचार पत्र के माध्यम से अत्यंत महत्वपूर्ण मांग यह है कि जिला कलेक्टर और उच्च प्रशासन को अब सख्त और बाध्यकारी आदेश जारी करने चाहिए।
इन आदेशों में स्पष्ट उल्लेख हो कि यदि भविष्य में—
किसी स्कूल वाहन में ओवरलोडिंग पाई गई,
फिटनेस/परमिट नियमों का उल्लंघन हुआ,
सुरक्षा मानकों की अनदेखी मिली,
तो अभिभावक, स्कूल संचालक, वाहन चालक और संबंधित विभागीय अधिकारी—सभी को बराबर जिम्मेदार मानते हुए तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सिर्फ इसी मॉडल से रीवा संभाग में लगातार बढ़ रही परिवहन अव्यवस्थाओं पर विराम लग सकता है।
समाचार पत्र का कर्तव्य — जनता की आवाज शासन तक पहुंचाना
हमारी जिम्मेदारी सिर्फ खबर छापना नहीं, बल्कि उस आवाज को शासन, प्रशासन और समाज तक पहुँचाना है, जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है।
हम लगातार ऐसे मुद्दों को उजागर करते रहेंगे।
सरकार, जनप्रतिनिधि, अधिकारी, अभिभावक या स्कूल संचालक इस पर विचार करें या न करें—
पर जनता की सुरक्षा के सवाल पर हमारी कलम हमेशा मुखर रहेगी।





