धान खरीदी में ‘धन वर्षा’ का दौर शुरू? केंद्र निर्धारण की प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल – किसानों में रोष बढ़ा
रीवा/मऊगंज। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी वर्ष 2025–26 की तैयारियाँ जिले में शुरू हो चुकी हैं, लेकिन खरीदी केंद्रों के निर्धारण से लेकर स्थल चयन तक की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। स्थानीय किसानों एवं समितियों का आरोप है कि केंद्र निर्धारण में नियम-कायदों को दरकिनार कर “जिसकी जितनी सेवा, उसकी उतनी सुविधा” का फार्मूला लागू कर दिया गया है। कई स्थानों पर बिना किसी तकनीकी परीक्षण, बिना आवश्यक संसाधनों के, और बिना समितियों की पात्रता परखें केंद्र घोषित कर दिए गए हैं।
किसानों का कहना है कि धान खरीदी में पारदर्शिता के बजाय “प्रभाव, पहुँच और दबाव” का खेल स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जिससे भ्रष्टाचार के नए अध्याय शुरू होने की आशंका बढ़ गई है।
केंद्र निर्धारण की प्रक्रिया सवालों के घेरे में
1. समितियों में कर्मचारी ही नहीं — फिर केंद्र कैसे चलेंगे?
कई समितियों में पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी वहाँ खरीदी केंद्र बना दिए गए।
स्थानीय किसान पूछ रहे हैं—
“जहाँ स्टाफ ही नहीं, वहाँ तुलाई और रिकॉर्ड कौन संभालेगा?”
2. खरीदी स्थल बारिश में सुरक्षित नहीं — धान नष्ट होने का खतरा
कई केंद्र ऐसे स्थानों पर बनाए गए हैं जहाँ:
न हार्ड फ्लोर
न शेड
न मेड़
केवल कीचड़ और गाद
ऐसे स्थान पर धान खरीदी होने पर बारिश की स्थिति में फसल नष्ट होने का खतरा रहता है।
15 किलोमीटर दूर सुरक्षित गोदाम को छोड़कर समीप के ओपन मैदान को “गोदाम स्तर” मान लेना भी किसानों की समझ से परे है।
3. समिति की आर्थिक क्षमता का परीक्षण ही नहीं किया गया
किसी समिति के पास पर्याप्त धन, संसाधन या प्रबंधन क्षमता है अथवा नहीं — इसकी जाँच किए बिना ही केंद्र बना दिए गए।
यह प्रश्न उठ रहा है—
“क्या सरकार को सिर्फ केंद्र बढ़ाने थे या खरीदी सुचारु रूप से करवानी थी?”
धान की वजन अनियमितता—हर साल की बड़ी समस्या
तौल कांटे में 5 से 10 क्विंटल तक की ‘सेटिंग’ होने की शिकायतें हर वर्ष आती हैं।
परिवहन के दौरान प्रति ट्रैक्टर 4 से 10 बोरियाँ धान चोरी होने के आरोप सामान्य हो गए हैं।
40 किलो वाली बोरी में अक्सर 37–38 किलो ही धान मिलना किसानों के अनुसार वर्षो से ‘सिस्टम’ का हिस्सा बन चुका है।
इन शिकायतों पर अभी तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
केंद्रों का बार-बार बदला जाना—किसका दबाव? कौन जिम्मेदार?
केंद्र निर्धारण कमेटी की भूमिका पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
कई स्थानों पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि:
जनप्रतिनिधियों के आवेदन पत्र के आधार पर केंद्र बदले गए
बिना स्थल निरीक्षण केंद्र घोषित कर दिए गए
दो-दो किलोमीटर के दायरे में कई-कई केंद्र खोल दिए गए
यदि पहला निर्धारण गलत था, तो जिम्मेदार कौन?
और यदि सही था, तो बार-बार परिवर्तन क्यों?
यह मनमानी न केवल खरीदी अव्यवस्थित कर रही है बल्कि वित्तीय अनियमितताओं की आशंका और भी बढ़ा रही है।
विभाग से प्रतिक्रिया मांगने पर नहीं मिला संतोषजनक जवाब
इस गंभीर आरोपों की जानकारी विभाग के संबंधित अधिकारियों से साझा करने का प्रयास किया गया,
लेकिन कोई ठोस या तथ्यपरक उत्तर उपलब्ध नहीं कराया गया।
यही कारण है कि अधिकांश आरोप अभी “जनचर्चा” और “स्थानीय प्रतिक्रिया” पर आधारित हैं,
जिसकी वास्तविकता विभागीय जांच के बाद ही सामने आ सकेगी।
कमेटी, अधिकारी और जनप्रतिनिधि—सभी पर उठ रहे सवाल
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान व्यवस्था से किसान असंतुष्ट हैं।
केंद्र निर्धारण प्रक्रिया, स्थल निरीक्षण, गोदाम चयन और वजन प्रणाली — सभी पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग चुके हैं।
फिलहाल किसानों और स्थानीय संगठनों की मांग है कि:
सभी केंद्रों का पुनरीक्षण किया जाए
स्थल निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक हो
तौल कांटे की कैलिब्रेशन जांच करवाई जाए
अनियमितताओं पर उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाए
संभागीय स्तर पर जांच की उम्मीद
किसानों का मानना है कि यदि मौजूदा शिकायतों में सत्यता पाई गई तो कई अधिकारी, कर्मचारी और संबंधित व्यक्ति कार्रवाई की जद में आ सकते हैं।
संभागीय आयुक्त से यह अपेक्षा बढ़ गई है कि
रीवा एवं मऊगंज, दोनों जिलों में धान खरीदी की प्रक्रिया की गंभीरता से जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए।


