राष्ट्रीय राजमार्गों पर वृक्षारोपण में भारी लापरवाही—पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहा खेल बेनकाब
रीवा संभाग में राष्ट्रीय राजमार्ग 30 एवं 35 के किनारों पर किए जाने वाले वृक्षारोपण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। वर्ष 2018 के बाद जब इन राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण कार्य प्रारंभ हुए, तब नियमों के अनुसार सड़क चौड़ीकरण के दौरान कटे वृक्षों की जगह उसी प्रजाति के वृक्षों को 10% अतिरिक्त संख्या के साथ दोबारा रोपित किया जाना अनिवार्य था। निर्माण कार्य पूरा होने में पाँच वर्ष का समय बीत गया, लेकिन पटरी पर अपेक्षित संख्या में वृक्ष आज भी दिखाई नहीं देते।
वृक्षारोपण एजेंसियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
निर्माण कंपनियों और वृक्षारोपण एजेंसियों की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद ऐसा प्रतीत होता है कि नियमों को कागजों में सीमित कर दिया गया। न तो समय पर पौधारोपण हुआ, न ही लगाए गए पौधों की सुरक्षा। कई स्थानों पर तो ऐसा भी देखा गया कि बचे हुए पुराने वृक्षों की आधा-धुँध कटाई कर उन्हें डामर पकाने के लिए ईंधन की तरह उपयोग किया गया। इससे यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो गया है कि बाईपास निर्माण के कारण कितने पेड़ वास्तव में बचे और कितने समाप्त हो गए।
बाईपास के अंदर भी वृक्षों की स्थिति चिंताजनक
गढ़, कटरा ,गंगेव, मनगवा, सहित कई स्थानों पर पुराने वृक्ष आज भी खड़े हैं, लेकिन उनकी संख्या वर्ष दर वर्ष कम होती जा रही है। बाईपास निर्माण के दौरान जिन पेड़ों को सुरक्षित माना गया था, वे भी उपेक्षा का शिकार हुए हैं। दूसरी ओर, वृक्षारोपण के नाम पर ठेके उन्हीं लोगों को मिलते रहे जो सत्ता के नज़दीकी माने जाते हैं। किस्तें जारी होती रहीं, लेकिन ज़मीन पर पौधे लगाने से ज़्यादा कागजों में हरियाली उगाई जाती रही।
यदि ईमानदारी से वृक्षारोपण होता, तो रीवा आज ‘ग्रीन कॉरिडोर’ बन चुका होता
पिछले 20 वर्षों में पंचायतों, शासकीय विभागों एवं विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत जितने पौधे लगाने के दावे हुए, अगर उनमें से सिर्फ 50% भी धरती पर जीवित होते, तो आज रीवा जिला एक घने हरित वन क्षेत्र जैसा दिखाई देता। तापमान में भी भारी कमी आती और गर्मी से होने वाली परेशानियाँ बहुत हद तक नियंत्रित होतीं। लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण हजारों-लाखों पौधे या तो लगाए ही नहीं गए या शुरुआती देखभाल के अभाव में सूखकर खत्म हो गए।
विकास की रफ्तार, पर पर्यावरण का ह्रास—आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा
आज पक्की सड़कें, पक्के मकान और वाहनों की संख्या में तेज़ वृद्धि आधुनिक विकास का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन यदि वृक्ष ही नहीं रहेंगे तो इन सब से निकलने वाली ताप, प्रदूषण और धूल को नियंत्रित कौन करेगा?
पर्यावरण विज्ञानी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि—
“ताप नियंत्रण के दो ही प्राकृतिक साधन हैं—वृक्ष और जल।”
लेकिन शायद यही दो साधन भ्रष्टाचार और लालच की भेंट चढ़ते जा रहे हैं।
धन की तिजोरी गर्मी को ठंडा नहीं कर सकती…
नोटों की गड्डियाँ पर्यावरण को शुद्ध नहीं कर सकतीं…
और जब आने वाली पीढ़ी जल और छाया के लिए तड़पेगी, तब आज की यह लापरवाही इतिहास में एक काला अध्याय लिखेगी।
जनता और सामाजिक संगठन लगातार आवाज उठा रहे हैं कि वृक्षारोपण केवल औपचारिकता न बने, बल्कि जिम्मेदारी, निगरानी और पारदर्शिता के साथ हो।
अब सवाल यह है कि—
सत्ता में बैठे लोग कब जागेंगे?
कब पर्यावरण को विकास की प्राथमिकता सूची में ऊपर रखा जाएगा?


