दूषित पानी बना मौत का कारण, बच्चों की जान पर भारी प्रशासनिक लापरवाही
इंदौर में मौतों के बीच मंत्री का अमर्यादित बयान, सरकार की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल
प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर शहर से एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और मानवीय संवेदनहीनता की बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। दूषित पेयजल की आपूर्ति के चलते सैकड़ों बच्चे बीमार पड़ गए हैं, जबकि कुछ मासूमों की मौत की खबरों ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। अस्पतालों में भर्ती बच्चों की हालत नाजुक बताई जा रही है और परिजन अपने बच्चों की जान बचाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीते कई दिनों से शहर के कई इलाकों में गंदे, बदबूदार और कीटाणुयुक्त पानी की आपूर्ति की जा रही थी। स्थानीय नागरिकों ने इसकी शिकायत नगर निगम, जल विभाग और जनप्रतिनिधियों से कई बार की, लेकिन प्रशासन की ओर से न तो पानी की सप्लाई रोकी गई और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की गई। नतीजतन, दूषित पानी का सेवन करने से छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
अस्पतालों में हाहाकार, परिजनों में आक्रोश
शहर के सरकारी और निजी अस्पतालों में बीमार बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कई बच्चों को उल्टी-दस्त, तेज बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत के बाद भर्ती कराया गया है। परिजनों का आरोप है कि समय पर इलाज और पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि अस्पतालों के बाहर भीड़ और अफरा-तफरी का माहौल है।
मंत्री का बयान बना विवाद की वजह
इसी बीच, इस गंभीर मामले पर प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री एवं इंदौर विधायक कैलाश विजयवर्गीय का बयान विवादों के घेरे में आ गया है। मीडिया द्वारा जब उनसे बच्चों की तबीयत बिगड़ने और मौतों को लेकर सवाल पूछे गए, तो आरोप है कि उन्होंने बेहद असंवेदनशील और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मंत्री द्वारा “घंटा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिसे आमजन और पत्रकारों ने अपमानजनक और गैर-जिम्मेदाराना बताया है।
जनप्रतिनिधि से संवेदनशीलता की अपेक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब जनता संकट में हो, तब एक जनप्रतिनिधि से संवेदनशीलता, जवाबदेही और समाधान की उम्मीद की जाती है। लेकिन मंत्री का यह रवैया सरकार की कार्यशैली और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते जल आपूर्ति की निगरानी की जाती और शिकायतों पर कार्रवाई होती, तो मासूमों की जान बचाई जा सकती थी।
जिम्मेदारी किसकी?
नगरीय प्रशासन विभाग सीधे तौर पर जल आपूर्ति और नगर निगम की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस गंभीर लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या मामला फिर जांच और आश्वासनों तक सीमित रह जाएगा?
विपक्ष का हमला, जांच की मांग
इस पूरे मामले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी दलों ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई, मृत बच्चों के परिजनों को मुआवजा और पीड़ित परिवारों के इलाज का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाने की मांग की है।



