राजस्व विवाद और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान किसान
मेरा नाम रूप प्रसाद पटेल है। मैं ग्राम कुसहा का निवासी हूँ। मेरे पिता का नाम तिलधारी पटेल है।
मैं अपने गांव में अपनी पैतृक भूमि पर मकान निर्माण कर रहा हूँ। जिस भूमि पर निर्माण किया जा रहा है, वह मेरी सांखाते की जमीन है। पूर्व में जब मैंने निर्माण कार्य शुरू किया था, तब विरोधी पक्ष द्वारा बिना किसी वैध कारण के निर्माण कार्य रुकवाया गया।
इस विवाद को लेकर मैंने पहले तहसील कार्यालय में आवेदन दिया, जहां से स्थगन (स्टे) प्राप्त किया गया। इसके बाद विरोधी पक्ष द्वारा उस आदेश को निरस्त कराने का प्रयास किया गया, लेकिन वह खारिज हो गया। फिर मामला अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) के समक्ष गया, जहां से भी आदेश प्राप्त हुआ।
इसके बावजूद, मौके पर जब तहसीलदार और पटवारी उपस्थित थे, तब भी निर्माण कार्य में बाधा डाली गई। मैंने इसकी सूचना पुलिस थाने में दी। पुलिस मौके पर आई और काम रुकवाया, लेकिन पुलिस के चले जाने के बाद पुनः अवैध रूप से निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। लगभग ढाई से तीन घंटे बाद जब पुलिस दोबारा आई, तब काम करने वाले लोग भाग गए।
इसी दौरान विरोधी पक्ष द्वारा मेरे परिवार के एक लड़के के साथ मारपीट भी की गई। इस पूरे विवाद में अब तक मुझे लगभग 20,000 रुपये का खर्च उठाना पड़ा है।
जब मैं संबंधित कागजात लेकर थाने गया, तो वहां भी मुझसे 2,000 रुपये स्टे की तामीली के नाम पर लिए गए। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक गरीब किसान को न्याय पाने के लिए बार-बार कार्यालयों और थानों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और हर स्तर पर पैसे की मांग की जा रही है।
मैं मऊगंज कलेक्टर महोदय एवं रीवा संभाग के संभागीय आयुक्त महोदय से आग्रह करता हूँ कि वे इस गंभीर विषय पर ध्यान दें। राजस्व न्यायालय और तहसील कार्यालय मजाक बनकर रह गए हैं। किसानों के पैसे बर्बाद हो रहे हैं, विवाद बढ़ रहे हैं, खून-खराबा हो रहा है, यहां तक कि जानें भी जा रही हैं।
राजस्व विभाग की जिम्मेदारी है कि वह मौके पर तुरंत पहुंचकर यह स्पष्ट करे कि किस भूमि पर किसका अधिकार है और स्टे आदेश की अवहेलना करने वालों पर सख्त कार्रवाई करे। लेकिन दुर्भाग्यवश कभी तहसील से, कभी एसडीएम से आदेश जारी होते हैं और पुलिस भी स्टे की तामीली के नाम पर पैसे लेती है।
यह स्थिति न केवल शर्मनाक है, बल्कि आम किसान के लिए न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

