जब रक्षक ही नियम तोड़ें: रीवा के कुछ थानों पर उठते गंभीर सवाल
जब पूरा शहर नींद की आगोश में होता है, तब नागरिकों की सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस पर होती है। रात के अंधेरे में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराध पर अंकुश लगाना और आपात परिस्थितियों में तत्काल मदद पहुँचाना पुलिस की प्राथमिक भूमिका है। लेकिन रीवा जिले के कुछ थानों से छनकर आ रही चर्चाएं और कथित घटनाएँ सुशासन के दावों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती नजर आ रही हैं।
जनचर्चा और विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिले के कुछ थानों में देर रात 11 बजे के बाद गश्त और निगरानी की जगह कथित तौर पर अनुशासनहीन गतिविधियाँ देखने को मिल रही हैं। आरोप हैं कि कुछ स्थानों पर ड्यूटी के दौरान ही शराबखोरी जैसी गतिविधियाँ होती हैं, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली और जिम्मेदारी पर सवाल उठ रहे हैं।
वर्दी की गरिमा पर सवाल
जनवरी 2026 में रीवा के एक थाना क्षेत्र से सामने आई घटना इन चर्चाओं को और बल देती है। बताया जा रहा है कि थाना परिसर के भीतर कथित रूप से ‘नशा पार्टी’ जैसी स्थिति बन गई थी। नशे की हालत में मौजूद कुछ कर्मचारी आपस में उलझ पड़े, बात गाली-गलौज और हाथापाई तक पहुँच गई। स्थिति को नियंत्रित करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।
हालाँकि इन घटनाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ये आरोप सत्य हैं तो यह पुलिस की गरिमा और अनुशासन दोनों पर गंभीर आघात माना जाएगा।
सीसीटीवी फुटेज में छिपा सच?
एक अन्य कथित घटना में बताया जा रहा है कि नशे की हालत में एक अधिकारी संतुलन खो बैठे और थाना गेट पर गिरकर घायल हो गए। स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि यदि संबंधित थाने के सीसीटीवी फुटेज की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। इस घटना ने भी पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अपराध बढ़ने के पीछे लापरवाही?
शहर में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं के पीछे पुलिस की कथित लापरवाही को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। एक ओर पुलिस बल की कमी पहले से ही चुनौती बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर यदि तैनात कर्मी ड्यूटी के समय अनुशासनहीनता में लिप्त पाए जाते हैं, तो कानून-व्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है।
जनचर्चा यह भी है कि यदि सुबह के समय संदिग्ध कर्मचारियों का मेडिकल परीक्षण कराया जाए, तो सच्चाई स्पष्ट हो सकती है।
प्रशासन से अपेक्षा
इन तमाम आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस कथित ‘दरबारी संस्कृति’ पर लगाम लगाएंगे? आम जनता की अपेक्षा है कि पुलिस अधीक्षक और वरिष्ठ अधिकारी निष्पक्ष जांच कराएं, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता तथा अनुशासन सुनिश्चित किया जाए।
क्योंकि जब रक्षक ही नियमों की अनदेखी करने लगें, तो आम नागरिक की सुरक्षा और विश्वास दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।

