मुस्तरका भूमि विवाद में अशिक्षित किसान दर-दर भटकने को मजबूर सरकारी दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर नहीं मिल रही न्याय तक पहुँच
मध्य प्रदेश सरकार भले ही अशिक्षित एवं गरीब लोगों को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने का दावा करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आती है। इसका जीवंत उदाहरण लोरी गांव निवासी अंबिका भारती, पिता राम मनोहर भारती, तहसील मनगवा जिला रीवा का मामला है, जो वर्षों से अपनी ही मुस्तरका (संयुक्त) भूमि में हक पाने के लिए तहसील और एसडीएम कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
अंबिका भारती एक अशिक्षित व्यक्ति हैं। उनके अनुसार, उनकी मुस्तरका भूमि को सह-हिस्सेदारों द्वारा साझे में लेकर या बिना समझ के बेच दिया गया। बिक्री के समय न तो उनकी सहमति ली गई और न ही उन्हें उनका उचित हिस्सा दिया गया। अब स्थिति यह है कि जो भूमि बची है, उस पर वे बराबर का हिस्सा मांग रहे हैं।
अंबिका भारती का स्पष्ट कहना है कि
> “जितनी जमीन पहले बेच दी गई है, उसे मुस्तरका मानकर उतनी जमीन काट ली जाए और शेष भूमि में मुझे मेरा न्यायोचित हिस्सा दिया जाए। मैं किसी विवाद में नहीं जाना चाहता, सिर्फ अपना हक चाहता हूँ।”
लेकिन यह मांग केवल कागजों और आश्वासनों तक सीमित रह गई है।
जब उन्होंने तहसील कार्यालय में अधिकारियों से बात की तो उनसे बार-बार यही पूछा गया—
नाम क्या है? पिता का नाम क्या है? कहां के निवासी हैं? किस तहसील से मामला है?
हर बार वही सवाल, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं।
एसडीएम साहब ने बातचीत में कहा कि यह मामला पूर्व में एसडीओ के आदेश से जुड़ा है और कार्रवाई के लिए पुराने कागजात, खसरा और संपूर्ण दस्तावेज लाने को कहा गया। तहसीलदार साहब ने भी पुराने खसरे की मांग की। वहीं एसडीएम साहब का यह भी कहना रहा कि यदि कागज गलत है, तो उसी आधार पर खसरा पेश किया जाए।
अंबिका भारती का पुत्र विनोद भारती भी इस मामले में शामिल है, लेकिन परिवार के पास न तो पर्याप्त जानकारी है और न ही कानूनी समझ, जिसके कारण वे लगातार असमंजस में फँसे हुए हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि
आज तक उन्हें केवल आश्वासन मिले, समाधान नहीं।
सरकारी योजनाओं में निःशुल्क विधिक सहायता की बात कही जाती है, लेकिन ऐसे अशिक्षित ग्रामीण जब वास्तविक न्याय के लिए आगे आते हैं, तो प्रक्रियाओं की जटिलता और प्रशासनिक उदासीनता उन्हें तोड़ देती है। न्यायालय और कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते लोग थककर बैठ जाते हैं और अंततः अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि
क्या सच में गरीब और अशिक्षित व्यक्ति के लिए न्याय सुलभ है?
या फिर सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं?




