चार–पांच महीनों से बंद वृद्धा पेंशन, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर बुजुर्ग महिला
सरकार भले ही बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन देने के लिए वृद्धा पेंशन योजना चला रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। डागरडुआ पंचायत अंतर्गत कोल्हा गांव की एक बुजुर्ग महिला की वृद्धा पेंशन पिछले चार–पांच महीनों से बंद है, जिससे उनकी हालत बेहद दयनीय हो गई है।
पीड़िता ने बताया कि इससे पहले उन्हें नियमित रूप से वृद्धा पेंशन मिलती थी और उसी सहारे उनका गुज़ारा चलता था। लेकिन अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के पेंशन बंद कर दी गई। पेंशन बंद होने के बाद उन्होंने कई बार बैंक और संबंधित कार्यालयों का रुख किया, लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
बुजुर्ग महिला के अनुसार, जब वह बैंक पहुंचीं तो वहां से केवाईसी (KYC) कराने को कहा गया। उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत सीएससी केंद्र से केवाईसी भी करवा ली। इसके बावजूद पेंशन चालू नहीं हुई। इसके बाद कभी बैंक तो कभी ऑनलाइन प्रक्रिया का बहाना बनाकर उन्हें टाल दिया गया।
पीड़िता का कहना है कि पिछले चार–पांच महीनों से वह लगातार एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भटक रही हैं, लेकिन लैपटॉप कोई भी अधिकारी स्पष्ट जवाब देने को तैयार नहीं है। इस दौरान न तो पेंशन बहाल हुई और न ही यह बताया गया कि आखिर गलती कहां है।
पेंशन बंद होने से बुजुर्ग महिला की रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा है। इलाज, भोजन और अन्य जरूरी खर्चों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। आर्थिक तंगी के कारण कई बार उन्हें बिना दवा और बिना उचित भोजन के ही दिन गुजारने पड़ते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह अकेला मामला नहीं है। पंचायत क्षेत्र में कई बुजुर्गों की पेंशन इसी तरह तकनीकी कारणों और प्रशासनिक लापरवाही के चलते रुकी हुई है। बावजूद इसके जिम्मेदार अधिकारी मामले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
ग्रामीणों और पीड़िता ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द वृद्धा पेंशन बहाल की जाए और बकाया राशि का भुगतान किया जाए। साथ ही ऐसी व्यवस्था की जाए कि बुजुर्गों को अपने हक के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
यह मामला सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है, जहां कागज़ों में सब कुछ ठीक दिखता है, लेकिन असल में जरूरतमंदों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है।




