रीवा/मऊगंज।
राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली और तहसीलों में व्याप्त अव्यवस्थाओं को लेकर अधिवक्ताओं ने खुलकर नाराजगी जताई है। रीवा अधिवक्ता संघ (मनगवां) के सचिव बृजेंद्र प्रताप सिंह ने प्रशासनिक ढिलाई और कथित अनियमितताओं पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि रीवा और मऊगंज जिले की अधिकांश तहसीलों में नियम-कायदों को दरकिनार कर काम किया जा रहा है। इससे आम नागरिकों का राजस्व व्यवस्था से विश्वास लगातार कमजोर हो रहा है।
फाइलों में अव्यवस्था, प्रक्रिया पर सवाल
अधिवक्ता संघ के अनुसार तहसीलों में न्यायालयीन फाइलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। कई प्रकरणों में—
फाइलों में सूची (इंडेक्स) संलग्न नहीं होती।
पेजिंग (क्रमांक अंकन) नहीं की जाती।
पेशी रजिस्टर व्यवस्थित नहीं हैं।
स्थिति यह है कि किसी भी दिन यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन-सा प्रकरण किस क्रमांक पर नियत है। इससे पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। संघ ने जिला प्रशासन और राजस्व विभाग से मांग की है कि राजस्व न्यायालयों का औचक निरीक्षण कराया जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
शासकीय जमीनों पर लापरवाही, निर्णय लंबित
अधिवक्ता संघ का आरोप है कि निजी प्रकरणों की सुनवाई तो किसी तरह हो जाती है, लेकिन शासकीय भूमि संरक्षण, अतिक्रमण हटाने और कंप्यूटर रिकॉर्ड सुधार से जुड़े मामलों को लंबे समय से लंबित रखा गया है।
बताया गया है कि—
शासकीय संपत्तियों के सुधार संबंधी प्रकरणों में 40-42 पेशियां हो चुकी हैं, फिर भी निर्णय नहीं हुआ।
कई शासकीय भवन, कार्यालय और सड़कों का विवरण आज भी खसरे या डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।
बालक स्कूल की भूमि क्रमांक 146, 151, 77 सहित कई भू-खंड वर्षों से विवादित और लंबित पड़े हैं।
संघ का कहना है कि यदि सरकारी जमीनों का रिकॉर्ड ही सुरक्षित और अद्यतन नहीं रहेगा, तो भविष्य में बड़े पैमाने पर विवाद और अतिक्रमण की आशंका बनी रहेगी।
नक्शे और खसरे में हेराफेरी का आरोप
बृजेंद्र प्रताप सिंह ने एक उदाहरण देते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार पटवारी हल्का गढ़ की भूमि क्रमांक 51, जो पुराने रिकॉर्ड में 1 एकड़ 25 डिसमिल दर्ज थी, उसे बढ़ाकर 1 एकड़ 40-42 डिसमिल कर दिया गया है।
यदि यह तथ्य सही है, तो यह जमीन के रकबे में बदलाव और संभावित हेराफेरी का मामला हो सकता है। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच न होने पर भविष्य में बड़े राजस्व विवाद खड़े हो सकते हैं।
वारिसान प्रकरणों में देरी और ‘सेवा शुल्क’ का आरोप
राजस्व न्यायालयों की सुस्त कार्यप्रणाली का असर नामांतरण (वारिसान) के मामलों पर भी पड़ा है। संघ का दावा है कि 10 से 15 वर्षों से कई प्रकरण लंबित हैं। आरोप यह भी है कि इन कार्यों के निष्पादन के लिए ‘सेवा शुल्क’ के नाम पर 15 से 20 हजार रुपये तक की अवैध वसूली दलालों के माध्यम से की जा रही है।
यदि ऐसा हो रहा है, तो यह शासन की मंशा और राजस्व सुधार अभियानों पर सीधा प्रश्नचिह्न है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई सड़कें और शासकीय भूमि आज भी नक्शों में दर्ज नहीं हैं, जिससे आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
विशेष जांच अभियान की मांग
अधिवक्ता संघ ने जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त से मांग की है कि राजस्व न्यायालयों में लंबित प्रकरणों की समीक्षा के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। यह जांच की जाए कि 5-6 वर्षों तक प्रकरण लंबित रखने के पीछे कारण क्या हैं और जिम्मेदारी किसकी है।
संघ ने चेतावनी भरे स्वर में कहा है कि यदि राजस्व न्यायालय अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के केंद्र बने रहे, तो आम जनता में आक्रोश बढ़ेगा। समय रहते पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, अन्यथा राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर आंच आ सकती है।

