रीवा-न्याय की बाट जोहती बेवा दिव्यांग: तहसील की चौखट पर तीन साल से ‘तारीख पर तारीख’
रीवा (मध्य प्रदेश)। शासन-प्रशासन द्वारा त्वरित न्याय और संवेदनशील व्यवस्था के दावे भले ही मंचों से गूंजते हों, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी फाइलों के बोझ और ‘स्थगन आदेश’ (स्टे) की प्रक्रिया में उलझी नजर आती है। ताजा मामला रीवा जिले की मनगवां तहसील अंतर्गत नायब तहसीलदार वृत्त गढ़ से सामने आया है, जहाँ एक बेसहारा और दिव्यांग महिला बीते तीन वर्षों से न्याय के लिए दर-दर भटकने को विवश है।
मामला क्या है?
ग्राम पंचायत लौरी कला निवासी उषा सिंह (पति स्व. नागेंद्र सिंह) अपने ही नाम दर्ज वैध पट्टे की भूमि पर मकान निर्माण के लिए संघर्ष कर रही हैं। पीड़िता का आरोप है कि उनकी जमीन पर विपक्षी पक्ष द्वारा बार-बार न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया जाता है, जिससे वह अपने आशियाने का निर्माण प्रारंभ नहीं कर पा रही हैं।
उषा सिंह का कहना है कि यह सिलसिला पिछले तीन वर्षों से जारी है और हर सुनवाई पर उन्हें “तारीख पर तारीख” ही मिल रही है। परिणामस्वरूप, उनका जीवन अस्थिरता और असुरक्षा के बीच गुजर रहा है।
दिव्यांगता और वैध स्वामित्व के बावजूद बेबसी
उषा सिंह शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई है। वह अपने पुत्र पुष्पेंद्र सिंह के साथ नायब तहसीलदार कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगा चुकी हैं।
उनका कहना है—
संबंधित भूमि उनके नाम विधिवत दर्ज है और उन्हें वैध पट्टा प्राप्त है।
इसके बावजूद प्रभावशाली विपक्षी पक्ष बार-बार न्यायालय से स्थगन आदेश ले आता है।
उन्हें अब तक कोई प्रभावी शासकीय विधिक सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।
एक दिव्यांग विधवा महिला के लिए न्यायालयों और कार्यालयों के चक्कर लगाना शारीरिक व मानसिक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत कष्टकारी है। आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण उनका संघर्ष और भी कठिन हो गया है।
अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
जब इस प्रकरण में राजस्व अधिकारियों का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो स्पष्ट प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी। प्रशासनिक स्तर पर मौन साध लेना कई सवाल खड़े करता है। यदि महिला के पास वैध दस्तावेज और स्वामित्व प्रमाण हैं, तो फिर तीन वर्षों से प्रकरण लंबित क्यों है?
स्थगन आदेशों की आड़ में यदि किसी पक्ष द्वारा न्याय प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अन्यथा यह स्थिति न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
न्याय की अपेक्षा
समाचार पत्र के माध्यम से जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों से अपील की गई है कि वे इस मामले को संज्ञान में लें। एक बेसहारा दिव्यांग विधवा को उसके वैध अधिकार से वंचित न रहने दें।
राजस्व न्यायालय से अपेक्षा है कि प्रकरण की त्वरित सुनवाई कर निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित किया जाए, ताकि उषा सिंह को अपने ही पट्टे की भूमि पर छत नसीब हो सके।
तीन वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रही इस महिला की पीड़ा यह सवाल उठाती है—क्या न्याय केवल सक्षम और प्रभावशाली लोगों के लिए ही सुलभ है, या फिर प्रशासन सचमुच अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है?

