गढ़-रीवा मार्ग: प्रशासनिक अनदेखी और अतिक्रमण से बढ़ रहा मौत का ग्राफ
सड़कें बनीं हादसों का गलियारा, क्या जिम्मेदारों पर होगी कभी कार्रवाई?
जिले का गढ़-रीवा मार्ग सहित कई प्रमुख और ग्रामीण सड़कें आज आमजन के लिए सुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा साबित हो रही हैं। लगातार हो रही सड़क दुर्घटनाएं अब महज संयोग नहीं रहीं, बल्कि यह राजस्व विभाग, लोक निर्माण विभाग और स्थानीय प्रशासन की घोर लापरवाही का प्रत्यक्ष परिणाम बन चुकी हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) से लेकर ग्रामीण संपर्क मार्गों तक अतिक्रमण, अव्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता का ऐसा जाल फैला है, जिसमें हर दिन किसी न किसी की जान फंस रही है।
अतिक्रमण की भेंट चढ़ीं सड़कें, खत्म होती पटरियां
वाहनों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि के बावजूद सड़कों के चौड़ीकरण पर ध्यान देने के बजाय उन्हें और संकीर्ण होने दिया जा रहा है। तेंदुआ से देवतालाब, गढ़ से नईगढ़ी, गढ़ से कटरा बायपास जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर सड़क की पटरियां पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।
स्थानीय लोगों ने सड़कों के किनारे मवेशी बांधने, निजी बाड़ी, लकड़ियों के ढेर और अस्थायी निर्माण कर लिए हैं। परिणामस्वरूप, पैदल यात्रियों और दोपहिया चालकों के लिए सड़क पर चलना भी खतरे से खाली नहीं है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ प्रशासन की आंखों के सामने हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खामोशी नजर आती है।
अभिलेखों में हेराफेरी, अवैध कब्जों को संरक्षण
राष्ट्रीय राजमार्ग अंतर्गत परासी, गढ़ और मढ़ी जैसे क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तो पूरी कर ली गई, लेकिन सरकारी अभिलेखों में इसकी स्पष्ट प्रविष्टि न होने का फायदा भू-स्वामी और अतिक्रमणकारी उठा रहे हैं।
सरकारी जमीन की अवैध खरीद-बिक्री खुलेआम हो रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी या तो अनजान बने हुए हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं। विडंबना यह है कि प्रतिदिन 8-8 घंटे गश्त करने का दावा करने वाली MPRDC की टीमों को भी सड़क के बीचों-बीच रखे गए अवरोध और अतिक्रमण दिखाई नहीं देते।
हादसे, मुआवजा और फिर सन्नाटा
हर दुर्घटना के बाद कुछ दिनों तक हंगामा होता है, मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन जिन लोगों ने सड़क को निजी संपत्ति समझ लिया है, उनके खिलाफ आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की भूमिका केवल हादसे के बाद मुआवजा बांटने तक सीमित है? क्या सड़क सुरक्षा केवल कागजी योजनाओं और बैठकों तक ही रह गई है?
जिम्मेदारों पर कार्रवाई जरूरी, तभी बचेगी जान
आम नागरिकों का साफ कहना है कि जब तक जिले के आला अधिकारी, राजस्व विभाग और संबंधित एजेंसियों पर लापरवाही के लिए कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे।
यदि शासन वास्तव में सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम लगाना चाहता है, तो अतिक्रमणकारियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनानी होगी। साथ ही गश्त और निरीक्षण को केवल फाइलों तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।
अब बड़ा सवाल यही है—
क्या प्रशासन नींद से जागेगा या गढ़-रीवा मार्ग यूं ही मौत का रास्ता बना रहेगा?

