रीवा–मऊगंज में अवैध उत्खनन का काला खेल कागज़ों से गायब, धरातल पर हजारों करोड़ की मोरम–मिट्टी की खदानें
रीवा/मऊगंज।
विंध्य क्षेत्र का हृदय कहे जाने वाले रीवा संभाग और नवगठित जिला मऊगंज इन दिनों अवैध उत्खनन के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। पहाड़ी इलाकों से लेकर नदियों के किनारों तक, पत्थर, बालू, मोरम और हार्ड मिट्टी (मोरमलाल) की खुलेआम लूट मची हुई है। हैरानी की बात यह है कि जिन खदानों का नामोनिशान सरकारी अभिलेखों में दर्ज ही नहीं है, वहां से अब तक हजारों करोड़ रुपये मूल्य की मोरम और मिट्टी का उत्खनन कर बाजार में खपाया जा चुका है।
हर्रहा सहित कई गांवों में 50 फीट से अधिक गहरी खाइयां
मऊगंज तहसील के हर्रहा गांव समेत कई ग्रामीण इलाकों में जमीन को 40 से 50 फीट तक खोद डाला गया है। खेत, चारागाह और शासकीय भूमि खदानों में तब्दील हो चुकी है। बावजूद इसके, न तो खनिज विभाग के रिकॉर्ड में इन खदानों का उल्लेख है और न ही किसी वैध खनन लीज की जानकारी। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
नदियों का सीना छलनी, पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में
क्षेत्र से होकर बहने वाली नदियों से बालू का अवैध उत्खनन और परिवहन बिना किसी भय के जारी है। भारी मशीनों और डंपरों की आवाज अब ग्रामीण जीवन की पहचान बन चुकी है। पहाड़ी क्षेत्रों में पत्थर और मोरम की खुदाई से भू-स्खलन का खतरा बढ़ गया है, वहीं जलस्तर भी तेजी से गिर रहा है। पर्यावरणीय संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
बिना लीज, बिना रॉयल्टी—सीधे सरकारी राजस्व पर डाका
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ठेकेदार बिना किसी वैध अनुमति के मोरम और मिट्टी निकालकर सड़क निर्माण, भवन निर्माण और अन्य सरकारी–निजी परियोजनाओं में खपा रहे हैं। इससे सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी और टैक्स की भारी क्षति हो रही है। जानकारों के मुताबिक यह नुकसान हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
रसूखदार ठेकेदारों का संरक्षण, प्रशासन बेबस?
इस अवैध कारोबार के पीछे सत्ता और विपक्ष से जुड़े रसूखदार ठेकेदारों की भूमिका बताई जा रही है। यही कारण है कि पटवारी हल्का से लेकर तहसील और जिला स्तर तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आ रही। हाल ही में हर्रहा गांव में जांच के लिए पहुंचे अधिकारियों ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि “जमीन किसकी है, यह स्पष्ट नहीं है।” यह जवाब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
10 गुना जुर्माना और टैक्स वसूली सिर्फ कागज़ों तक?
मध्य प्रदेश खनिज नियमों के अनुसार अवैध उत्खनन पर खनिज मूल्य का 10 गुना तक जुर्माना और टैक्स वसूली का प्रावधान है। लेकिन अब तक न तो किसी बड़ी वसूली की खबर है और न ही किसी बड़े आरोपी पर ठोस कार्रवाई।
जनता के सवाल, प्रशासन से जवाब की उम्मीद
अब आमजन और सामाजिक संगठनों की निगाहें शासन और न्यायालय पर टिकी हैं। प्रमुख सवाल यह हैं—
क्या संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर खनिज व राजस्व विभाग की संयुक्त जांच टीम बनाकर हर पटवारी हल्के की निष्पक्ष जांच कराएंगे?
क्या अवैध खदानों को चिन्हित कर रसूखदार ठेकेदारों से खनिज टैक्स सहित 10 गुना पेनल्टी वसूली जाएगी?
क्या उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी, जिनकी नाक के नीचे यह अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा?
ग्रामीण जीवन और पर्यावरण पर गहरा संकट
अवैध उत्खनन का सबसे बड़ा खामियाजा ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों को भुगतना पड़ रहा है। कई गांवों में घरों, आंगनवाड़ी और सरकारी स्कूल भवनों में दरारें आ गई हैं। खेत बंजर हो रहे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं। पर्यावरणीय नुकसान आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
अब देखना यह है कि समाचार पत्रों में इस जनहित के मुद्दे के उजागर होने के बाद शासन–प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागता है या फिर रसूखदारों का यह अवैध उत्खनन का काला खेल यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा।




