रीवा में ‘विज्ञापन बनाम पत्रकारिता’ का टकराव: स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल, मीडिया की भूमिका भी कठघरे में
रीवा। जिले में इन दिनों एक गंभीर और चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से उभरकर सामने आ रही है, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े नर्सिंग होम, क्लीनिक और मेडिकल संस्थानों के बड़े-बड़े विज्ञापन प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के पन्नों पर छाए हुए हैं। स्थिति यह है कि कई अखबारों के मुख्य पृष्ठ और अंतिम पृष्ठ पर प्रतिदिन ऐसे विज्ञापन प्रकाशित हो रहे हैं, जिनकी चमक के बीच आम जनता की समस्याएं और शिकायतें कहीं दबती नजर आ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इन विज्ञापनों के आर्थिक दबाव ने मीडिया की निष्पक्षता और निर्भीकता को प्रभावित किया है? क्या यही कारण है कि कई मामलों में स्वास्थ्य विभाग की अनियमितताओं, अवैध नर्सिंग होम संचालन, और मेडिकल माफिया के खिलाफ खुलकर आवाज उठाने का साहस कम होता जा रहा है?
व्यावसायिक हितों के बीच दबती पत्रकारिता
सूत्रों के अनुसार, कुछ समाचार पत्रों में ऐसे व्यक्तियों को संपादकीय या ब्यूरो स्तर की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिनका प्राथमिक उद्देश्य पत्रकारिता न होकर व्यवसायिक लाभ अर्जित करना है। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की मूल भावना के विपरीत है, बल्कि जनता के विश्वास के साथ भी एक तरह का समझौता प्रतीत होती है।
विज्ञापन का पैसा—आखिर कहां से आ रहा है?
यह एक जांच का विषय है कि प्रतिमाह लाखों रुपये के विज्ञापन आखिर कौन दे रहा है। क्या यह राशि स्वयं डॉक्टरों द्वारा वहन की जा रही है, या फिर मेडिकल स्टोर संचालकों और नर्सिंग होम प्रबंधन के माध्यम से इसका भुगतान हो रहा है? यदि ऐसा है, तो क्या इन खर्चों को संबंधित डॉक्टर अपनी वार्षिक आय में दर्शा रहे हैं? क्या आयकर विभाग या स्वास्थ्य विभाग द्वारा इसकी कोई निगरानी की जा रही है?
पेड न्यूज का साया और पारदर्शिता का अभाव
पत्रकारिता में “पेड न्यूज” की आशंका भी इन हालातों में बलवती होती दिख रही है। यदि विज्ञापन और समाचार के बीच की रेखा धुंधली हो रही है, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है। सवाल यह भी है कि क्या इन विज्ञापनों की वैधता, उनके स्रोत और भुगतान की पारदर्शिता की कभी स्वतंत्र जांच होगी?
प्रशासनिक मौन या मिलीभगत?
इस पूरे परिदृश्य में प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या यह संभव है कि अधिकारियों की जानकारी के बिना इतना बड़ा विज्ञापन तंत्र संचालित हो रहा हो? या फिर पर्दे के पीछे कोई ‘आपसी समझ’ काम कर रही है—जहां न मीडिया प्रशासन पर सवाल उठाता है, और न ही प्रशासन मीडिया की गतिविधियों में हस्तक्षेप करता है?
पाठकों की भूमिका भी अहम
हालांकि, यह भी सत्य है कि रीवा में कई समाचार पत्र आज भी पूरी निष्ठा और निर्भीकता के साथ जनहित के मुद्दों को उठा रहे हैं। ऐसे में पाठकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे विवेकपूर्ण निर्णय लें और उन माध्यमों को प्राथमिकता दें, जो सच को सामने लाने का साहस रखते हैं।
उद्देश्य—जवाबदेही, न कि आरोप
इस पूरे मुद्दे को उठाने का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या वर्ग विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक घटक को उसके दायित्व की याद दिलाना है। यदि कोई भी संस्था—चाहे वह मीडिया हो या स्वास्थ्य विभाग—अपने कर्तव्यों से भटककर केवल आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने लगेगी, तो यह समाज के लिए घातक सिद्ध होगा।


