रीवा में अवैध शराब कारोबार पर उठे गंभीर सवाल
“छोटे कर्मचारियों पर नहीं, असली सरगनाओं पर हो कार्रवाई” — सोशल मीडिया पोस्ट से मचा हड़कंप
रीवा जिले में अवैध शराब कारोबार को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक पोस्ट ने आबकारी विभाग, पुलिस प्रशासन और कथित शराब सिंडिकेटों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। पोस्ट में आरोप लगाया गया है कि जिले में विभिन्न ग्रुपों द्वारा आबकारी विभाग की कथित मिलीभगत से दिनदहाड़े अवैध शराब की पैकारी और सप्लाई का खेल लगातार जारी है।
पोस्ट में दावा किया गया है कि यह तस्वीर शाम लगभग 7:30 बजे की है, जिसमें कथित तौर पर अवैध शराब परिवहन से जुड़े लोग दिखाई दे रहे थे। हालांकि पोस्ट करने वाले व्यक्ति ने “इंसानियत” का हवाला देते हुए संबंधित व्यक्तियों के चेहरे और वाहन नंबर प्लेट को जानबूझकर ब्लर कर दिया, ताकि निचले स्तर पर काम करने वाले मजदूर या कर्मचारी कानूनी कार्रवाई और सामाजिक प्रताड़ना का शिकार न हों।
“गरीबी और बेरोजगारी का फायदा उठा रहे शराब माफिया”
पोस्ट में बेहद भावुक अंदाज में कहा गया है कि जो लोग शराब ढोने या सप्लाई का कार्य कर रहे हैं, वे महज 10-12 हजार रुपये की नौकरी करने वाले मजबूर लोग हैं। यदि कार्रवाई होती है तो जेल इन्हीं गरीब कर्मचारियों को जाना पड़ेगा, जबकि असली शराब माफिया और सिंडिकेट संचालकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पोस्ट में यह भी कहा गया कि बेरोजगारी इतनी अधिक है कि एक व्यक्ति के हटते ही दूसरा मजबूर व्यक्ति इस अवैध धंधे में लगा दिया जाएगा। ऐसे में कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहकर उन “बड़ी मछलियों” तक पहुंचनी चाहिए जो पूरे नेटवर्क को संचालित कर रही हैं।
पुलिस अधीक्षक और मुख्यमंत्री से की गई कार्रवाई की मांग
पोस्ट के माध्यम से रीवा पुलिस अधीक्षक से सीधे हस्तक्षेप की मांग की गई है। लेखक ने लिखा कि वह चाहता है कि “ताबड़तोड़ कार्रवाई” हो, लेकिन कार्रवाई का निशाना गरीब मजदूर नहीं बल्कि पूरे अवैध नेटवर्क को संचालित करने वाले लोग बनें।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का उल्लेख करते हुए प्रदेश की स्थिति पर चिंता जताई गई और कहा गया कि मध्यप्रदेश में अवैध शराब कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि जिम्मेदार विभाग “कुंभकर्णी नींद” में सोया हुआ है।
आबकारी विभाग की भूमिका पर उठे सवाल
सोशल मीडिया पोस्ट में आबकारी विभाग पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि विभाग की कथित शह के बिना इतना बड़ा नेटवर्क संचालित होना संभव नहीं है। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि इस कारोबार में प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है और “भाजपा के बड़े-बड़े नेता” तक इसमें शामिल बताए गए हैं।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पोस्ट के वायरल होने के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
“डर का माहौल, फिर भी उठ रही आवाज”
पोस्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि लेखक के पास कई साक्ष्य मौजूद हैं, लेकिन झूठे मुकदमे या किसी अप्रिय घटना के डर से वह खुलकर सामने आने से हिचक रहा है। यह बयान क्षेत्र में अवैध कारोबार और कथित संरक्षण को लेकर भय और दबाव के माहौल की ओर भी संकेत करता है।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
रीवा और आसपास के क्षेत्रों में अवैध शराब, कोरेक्स तस्करी और सीमावर्ती इलाकों से होने वाली अवैध सप्लाई को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं। स्थानीय स्तर पर लगातार शिकायतों और वायरल वीडियो के बावजूद यदि बड़े नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि सोशल मीडिया पर वायरल इस पोस्ट के बाद पुलिस और आबकारी विभाग क्या कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में छोटे कर्मचारियों से आगे बढ़कर उन लोगों तक कार्रवाई पहुंचती है, जिन पर पूरे अवैध कारोबार को संचालित करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

