रीवा में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर प्लांट को लेकर राष्ट्रीय वेबीनार, विशेषज्ञों ने जताए गंभीर खतरे
“परमाणु ऊर्जा नहीं, सौर और हरित ऊर्जा है भविष्य” — देशभर के पर्यावरणविदों और आरटीआई कार्यकर्ताओं की चेतावनी
रीवा में बड़े जनआंदोलन की तैयारी, चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी त्रासदियों का दिया उदाहरण
रीवा, 10 मई 2026। स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट
मध्यप्रदेश के रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र अंतर्गत रोझौही में प्रस्तावित लगभग 28 हजार करोड़ रुपये के टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर देशभर के पर्यावरणविदों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और परमाणु विरोधी विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। “फ्रॉम पावर टू पेरिल: अंडरस्टैंडिंग न्यूक्लियर रिस्क्स” विषय पर आयोजित 307वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में वक्ताओं ने दावा किया कि परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं जनजीवन, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं।
ऑनलाइन आयोजित इस राष्ट्रीय वेबीनार का संयोजन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े पर्यावरणविदों, तकनीकी विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई विशेषज्ञों ने भाग लेकर सरकार की परमाणु ऊर्जा नीति पर सवाल खड़े किए।
वेबीनार में तमिलनाडु के प्रसिद्ध परमाणु विरोधी आंदोलनकारी एवं “पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी” के नेता सुब्रमण्यम उदयकुमार ने मुख्य वक्ता के रूप में भाग लिया। उन्होंने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र आंदोलन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में परमाणु ऊर्जा न तो सुरक्षित है, न सस्ती और न ही टिकाऊ। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार निजी कंपनियों के हित में परमाणु नीति को बढ़ावा दे रही है, जबकि देश की कुल ऊर्जा आवश्यकता में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी मात्र 3 से 4 प्रतिशत ही है।
उन्होंने कहा कि भारत को सौर, पवन और ज्वारीय ऊर्जा जैसे सुरक्षित एवं हरित विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए। वक्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि हाल ही में पारित “शांति विधेयक 2025” के जरिए निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश देने की तैयारी की गई है, जिससे भविष्य में सुरक्षा और जवाबदेही के गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
गुजरात से जुड़े पर्यावरणविद महेश पांड्या और रजनी दवे ने परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को “विकास के नाम पर संभावित अभिशाप” बताते हुए कहा कि सरकार परमाणु संयंत्रों से जुड़े वास्तविक जोखिमों और रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन पर पारदर्शिता नहीं बरत रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आरटीआई के माध्यम से महत्वपूर्ण जानकारियां क्यों छिपाई जाती हैं।
वेबीनार में उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन एवं प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने परमाणु ऊर्जा अधिनियम 2025 का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। उन्होंने परमाणु परियोजनाओं में स्वतंत्र निगरानी तंत्र और पारदर्शिता बढ़ाने की मांग की।
फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक एवं ट्रस्टी प्रवीण पटेल ने रीवा जिले में प्रस्तावित परियोजना को लेकर स्थानीय समुदायों, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण आबादी पर पड़ने वाले प्रभावों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि रोजगार और विकास के बड़े दावों के पीछे विस्थापन, पलायन, जल प्रदूषण और गंभीर बीमारियों जैसे खतरों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने वैश्विक परमाणु त्रासदियों का हवाला देते हुए रूस की चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना और जापान की फुकुशिमा दाइची परमाणु दुर्घटना का उदाहरण दिया। विशेषज्ञों ने दावा किया कि इन दुर्घटनाओं के दुष्प्रभाव आज भी समाप्त नहीं हुए हैं और विकिरण के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए।
बैठक में यह भी बताया गया कि रीवा जिले के क्योटी-रोझौही क्षेत्र की लगभग 167 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ रहा है। प्रतिभागियों ने आरोप लगाया कि परियोजना से पर्यावरणीय असंतुलन, जल स्रोतों पर खतरा और स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो सकते हैं।
वेबीनार के संयोजक शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि आने वाले दिनों में रीवा में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत गांव-गांव जाकर पोस्टर, पर्चे, मीडिया संवाद और जनसभाओं के माध्यम से लोगों को परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर संयुक्त ज्ञापन तैयार करने और बड़े स्तर पर आंदोलन की रणनीति भी बनाई जा रही है।
बैठक में यह सहमति बनी कि परमाणु ऊर्जा, पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन और जनसुरक्षा जैसे विषयों पर आगे भी लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी रखी जाएगी। प्रतिभागियों ने कहा कि यदि सरकार ने स्थानीय लोगों की चिंताओं को नजरअंदाज किया तो रीवा में व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा।


