मध्यप्रदेश में अवैध शराब, ओवररेटिंग और नशीले पदार्थों का फैलता जाल: क्या कानून व्यवस्था बिगड़ने का बन रहा बड़ा कारण?
भोपाल/मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में इन दिनों अवैध शराब बिक्री, निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली (ओवररेटिंग), गली-गली संचालित कथित पैकारी दुकानों तथा नशीली गोलियों और सिरप के बढ़ते कारोबार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। गांवों से लेकर कस्बों और शहरों तक लगातार मिल रही शिकायतों ने न केवल आबकारी व्यवस्था बल्कि प्रदेश की कानून व्यवस्था पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया, स्थानीय जनचर्चाओं और आम नागरिकों की शिकायतों में एक जैसी तस्वीर सामने आ रही है कि शराब और नशे का अनियंत्रित प्रसार सामाजिक अपराधों की जड़ बनता जा रहा है।
प्रदेश के कई हिस्सों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि अधिकृत दुकानों के अलावा अवैध रूप से शराब की बिक्री छोटे-छोटे ठिकानों, किराना दुकानों, ढाबों, गुमटियों और ग्रामीण अंचलों में खुलेआम जारी है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कई स्थानों पर शराब निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर बेची जा रही है, लेकिन शिकायतों के बावजूद कार्रवाई अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दे रही। इससे आम लोगों में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है।
गली-गली शराब पैकारी और नशीले पदार्थों का बढ़ता नेटवर्क
प्रदेश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कथित अवैध शराब पैकारी का जाल लगातार फैलने की चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां केवल लाइसेंसी दुकानों से बिक्री होनी चाहिए, वहां अवैध माध्यमों से शराब आसानी से उपलब्ध हो रही है। इसके साथ ही प्रतिबंधित या नियंत्रित नशीली गोलियां और कफ सिरप जैसे पदार्थ भी युवाओं तक पहुंचने के आरोप लग रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब नशे की उपलब्धता इतनी आसान हो जाती है, तब इसका सीधा असर समाज की शांति और सुरक्षा पर पड़ता है। परिवारों में विवाद, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं, युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति और आर्थिक बर्बादी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ने लगती हैं।
क्या बिगड़ती कानून व्यवस्था के पीछे नशे का बढ़ता दायरा?
प्रदेश में आए दिन सामने आने वाली लूट, मारपीट, चोरी, डकैती और हिंसक घटनाओं को लेकर अब एक नई बहस छिड़ गई है। कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि बढ़ती आपराधिक घटनाओं के पीछे नशे की आसान उपलब्धता एक प्रमुख कारण बनती जा रही है।
हालांकि हर अपराध को सीधे शराब या नशीले पदार्थों से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता, लेकिन विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जब किसी क्षेत्र में नशे की उपलब्धता बढ़ती है तो कानून व्यवस्था पर उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि प्रदेशभर में नशे के नेटवर्क और अपराध के बीच संबंधों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग भी उठने लगी है।
आबकारी विभाग और स्थानीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल
जनचर्चाओं में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि अवैध बिक्री और ओवररेटिंग जैसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है? कई जगहों से यह भी आरोप सामने आते रहे हैं कि शराब दुकानों पर निर्धारित रेट सूची स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं होती और उपभोक्ताओं से मनमानी वसूली की जाती है।
नियमों के अनुसार शराब दुकानों पर मूल्य सूची, स्टॉक रजिस्टर, सीसीटीवी निगरानी और तय समय सीमा का पालन अनिवार्य माना जाता है। लेकिन कई क्षेत्रों में इन नियमों के पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि कहीं निर्धारित समय से पहले दुकान खुलने या देर रात तक संचालन जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो यह सीधे नियामक तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
सोशल मीडिया बना जनआक्रोश का सबसे बड़ा मंच
पिछले कुछ समय में सोशल media पर शराब दुकानों, कथित ओवररेटिंग, अवैध बिक्री और नशे से जुड़ी शिकायतों के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। स्थानीय नागरिक, सामाजिक संगठन और आरटीआई कार्यकर्ता इन मामलों को खुलकर उठाते दिखाई दे रहे हैं। इससे यह मुद्दा अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रदेशव्यापी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
जनता का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी नियंत्रण और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल राजस्व या प्रशासनिक विषय नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक ताने-बाने और कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
उठ रही निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग
प्रदेश के कई हिस्सों से यह मांग उठ रही है कि अवैध शराब बिक्री, कथित ओवररेटिंग, नशीले पदार्थों के नेटवर्क और प्रशासनिक जवाबदेही की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। लोगों का कहना है कि यदि शिकायतें निराधार हैं तो अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदार व्यक्तियों और कथित नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।

