Breaking: CJI के बयान पर उठा राष्ट्रीय विमर्श, मीडिया, RTI और न्यायपालिका की भूमिका पर 308वें वेबीनार में मंथन
“आलोचना को विरोध मानना लोकतंत्र के लिए खतरनाक” — न्यायिक जवाबदेही, पारदर्शिता और डिजिटल मीडिया पर गहन चर्चा
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं को लेकर दिए गए कथित “काकरोच” एवं “पैरासाइट” संबंधी बयान के बाद न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रविवार को आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप इंडिया के तत्वावधान में तथा फोरम फॉर फास्ट जस्टिस एवं मिशन फ्री लीगल एजुकेशन के सहयोग से 308वां राष्ट्रीय आरटीआई एवं विधिक केंद्रित ऑनलाइन वेबीनार आयोजित किया गया, जिसमें देशभर से विधि विशेषज्ञों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभागियों ने भाग लिया।
सुबह 11 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक चले इस ऑनलाइन जूम वेबीनार में डिजिटल मीडिया, सूचना का अधिकार (RTI), न्यायपालिका की पारदर्शिता, न्यायिक भ्रष्टाचार, सोशल मीडिया एक्टिविज्म और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति जैसे संवेदनशील विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया।
वेबीनार में मुख्य रूप से इस प्रश्न पर चर्चा केंद्रित रही कि क्या लोकतंत्र में व्यवस्था की आलोचना करने वाले मीडिया, सोशल मीडिया कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट को “सिस्टम विरोधी” मानना उचित है? प्रतिभागियों ने यह भी सवाल उठाया कि कहीं आलोचनात्मक आवाजों को विरोध की संज्ञा देकर लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा।
कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुधीर कुमार सक्सेना तथा न्यायमूर्ति राजीव लोचन मेहरोत्रा की विशेष सहभागिता रही। दोनों वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों ने न्यायपालिका की गरिमा, सार्वजनिक वक्तव्यों में संतुलन और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि न्यायपालिका जैसे संवेदनशील संस्थानों से जुड़े व्यक्तियों के वक्तव्यों में सामाजिक सामंजस्य और संवेदनशीलता का होना आवश्यक है, क्योंकि ऐसे बयान व्यापक जनमानस को प्रभावित करते हैं।
RTI एक्टिविज्म और सोशल मीडिया की भूमिका पर चर्चा
वेबीनार में सोशल मीडिया और आरटीआई को लोकतांत्रिक जवाबदेही के प्रभावी माध्यम के रूप में देखा गया। वक्ताओं ने कहा कि सूचना का अधिकार कानून ने आम नागरिकों को शासन-प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का सशक्त उपकरण दिया है, किंतु इसके उपयोगकर्ताओं को कई बार प्रताड़ना, देरी, धमकी और प्रशासनिक उदासीनता का सामना करना पड़ता है।
प्रतिभागियों ने चिंता व्यक्त की कि सूचना मांगने वाले नागरिकों और आरटीआई कार्यकर्ताओं के प्रति नकारात्मक धारणा बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हो सकता है। चर्चा में यह भी कहा गया कि सिस्टम की आलोचना और संस्थाओं के प्रति असहमति को राष्ट्रविरोध या संस्थाविरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
न्यायिक भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर उठे सवाल
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुधीर कुमार सक्सेना ने न्यायिक भ्रष्टाचार और न्याय में देरी जैसे मुद्दों पर खुलकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार को उजागर करने में सूचना का अधिकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, हालांकि इसके लिए व्यवस्था में और अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही की आवश्यकता है।
उन्होंने न्यायपालिका में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे अधिवक्ताओं और अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका पर भी चिंता जताई तथा ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष न्यायालयों के गठन की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पेशेवर आचरण और नैतिक मानकों को मजबूत किया जाना जरूरी है।
विशेष न्यायालयों की मांग ने खींचा ध्यान
वेबीनार में एक महत्वपूर्ण सुझाव यह सामने आया कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित अधिवक्ताओं एवं विधिक पेशे से जुड़े व्यक्तियों के मामलों की सुनवाई हेतु विशेष अदालतों का गठन किया जाए, जिससे न्याय प्रक्रिया तेज हो और न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहे।
फोरम फॉर फास्ट जस्टिस से जुड़े प्रवीण पटेल ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में ईमानदार अधिवक्ताओं के सामने भी चुनौतियां बढ़ रही हैं, ऐसे में विधिक क्षेत्र में गुणवत्ता, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।
पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने जताई चिंता
कार्यक्रम में शामिल पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने न्यायपालिका और मीडिया के बीच संतुलित संबंधों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं के संदर्भ में की गई तीखी टिप्पणियां लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने जवाबदेही आधारित व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।
डिजिटल मीडिया और न्यायिक स्वतंत्रता पर विशेष प्रस्तुति
आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने “डिजिटल मीडिया और न्यायिक स्वतंत्रता” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 से 2023 के बीच डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने जनसरोकार के मुद्दों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, हालांकि इसके साथ गलत सूचना, न्यायालय अवमानना और संस्थागत विश्वसनीयता जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
उन्होंने सूचना आयोग की सीमित शक्तियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आयोग सूचना उपलब्ध कराने, जुर्माना लगाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है, लेकिन सीधे आपराधिक दंडादेश पारित करने का अधिकार उसके पास नहीं होता।
लोकतंत्र, आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल
वेबीनार में प्रतिभागियों ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या आलोचना को विरोध मानकर लोकतंत्र में आमजन की आवाज को सीमित किया जा रहा है? वक्ताओं का मानना था कि लोकतंत्र में संस्थाओं की रचनात्मक आलोचना स्वस्थ व्यवस्था का संकेत है और इसे असहमति के अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए।
करीब साढ़े तीन घंटे तक चले इस राष्ट्रीय वेबीनार का समापन प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें न्यायिक सुधार, पुलिस प्रताड़ना, जेल व्यवस्था, मानवाधिकार, झूठी एफआईआर और कानूनी उपचार जैसे अनेक मुद्दों पर प्रतिभागियों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिभागियों ने न्याय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।


