पूछती है जनता: रीवा में ‘स्वास्थ्य’ का हाल बेहाल, क्या हादसों और अनियमितताओं के पीछे कोई बड़ा खेल?
संजय गांधी अस्पताल में बार-बार आग, सुपर स्पेशलिटी में दरारें, दवा खरीदी जांच ठंडे बस्ते में—जनता के सवालों पर जवाब कब?
स्वतंत्र पत्रकार संजय पांडेय की विशेष रिपोर्ट | रीवा मध्यप्रदेश
रीवा—यह वही शहर है, जहां से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमान संभालने वाले प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री का राजनीतिक प्रतिनिधित्व जुड़ा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस जिले को स्वास्थ्य सुविधाओं का मॉडल बनना चाहिए था, वहीं आज सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, निर्माण गुणवत्ता, सुरक्षा व्यवस्थाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बीते कुछ वर्षों में सामने आई घटनाओं ने आमजन को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद रीवा के शासकीय अस्पताल विवादों और अव्यवस्थाओं से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे?
संजय गांधी अस्पताल में बार-बार आग: संयोग या गंभीर लापरवाही?
रीवा के प्रमुख शासकीय चिकित्सा संस्थान संजय गांधी अस्पताल में पिछले दो वर्षों के दौरान आग लगने की कई घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। इनमें से एक घटना उस समय सामने आई जब अस्पताल परिसर में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित था। घटना में मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ीं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठे।
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज है कि आखिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? यदि भवन पुराना है, विद्युत भार बढ़ चुका है और तकनीकी क्षमता सीमित है, तो समय रहते आवश्यक उन्नयन और सुरक्षा प्रबंधन क्यों नहीं किया गया?
हर घटना के बाद “जांच जारी है” का आश्वासन तो सामने आता है, लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या जांच प्रतिवेदन सार्वजनिक किए गए? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? यदि नहीं, तो आखिर क्यों?
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में दरारों ने बढ़ाई चिंता
हाल के दिनों में सुपर स्पेशलिटी अस्पताल भवन में कथित रूप से दरारें आने की चर्चाओं ने आम नागरिकों के मन में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार संस्थान की गुणवत्ता को लेकर लोगों के बीच चिंता देखी जा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि किसी शासकीय भवन में संरचनात्मक कमजोरी के संकेत मिलते हैं, तो उसकी स्वतंत्र तकनीकी जांच और गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए। ऐसे मामलों में पारदर्शिता ही जनता के विश्वास को बनाए रख सकती है।
सरकारी अस्पताल बनाम निजी स्वास्थ्य संस्थान: जनता के मन में उठते सवाल
शहर में यह धारणा भी लगातार चर्चा में है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की कार्यक्षमता कमजोर पड़ने का सीधा लाभ निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम को मिल रहा है। हालांकि इस विषय में आधिकारिक स्तर पर कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है, लेकिन नागरिकों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या सरकारी व्यवस्थाओं की कमजोरी गरीब और मध्यम वर्ग को महंगे इलाज की ओर धकेल रही है?
सरकारी अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा, संसाधनों की कमी और अव्यवस्था की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि भरोसे का पुनर्निर्माण भी है।
दवा खरीदी और जांच प्रतिवेदन: कार्रवाई क्यों नहीं?
जिला दवा भंडार से जुड़े दवा खरीदी प्रकरण को लेकर भी प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। संबंधित स्तरों पर जांच होने और रिपोर्ट सामने आने की चर्चाओं के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई का अभाव जनचर्चा का विषय बना हुआ है।
जनता पूछ रही है—यदि किसी स्तर पर प्रक्रियागत त्रुटि या वित्तीय अनियमितता पाई गई थी, तो जिम्मेदारों की जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई? क्या शासन स्तर पर ऐसे मामलों को समयबद्ध निष्पादन की आवश्यकता नहीं?
विकास कार्यों पर भी उठ रहे प्रश्न
रीवा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और विकास से जुड़े कई परियोजनाओं को लेकर भी नागरिकों के बीच असंतोष दिखाई देता है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल पूछा जा रहा है कि जिन योजनाओं का शिलान्यास हुआ, उनकी पूर्णता और जनहित में उपयोगिता की स्थिति क्या है? रोजगार, स्थानीय भागीदारी और संसाधनों के उपयोग को लेकर पारदर्शिता की मांग तेज होती जा रही है।
विपक्ष की चुप्पी पर भी सवाल
लोकतंत्र में सत्ता के साथ-साथ विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और प्रशासनिक सवालों को लेकर विपक्ष की अपेक्षाकृत सीमित सक्रियता भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
जनता का एक वर्ग पूछ रहा है कि जिन मुद्दों पर व्यापक बहस और जनआंदोलन होने चाहिए, वहां राजनीतिक दलों की मुखरता क्यों दिखाई नहीं देती? हालांकि राजनीतिक दलों की अपनी रणनीतियां और प्राथमिकताएं हो सकती हैं, लेकिन जनसरोकार के मुद्दों पर सक्रियता की अपेक्षा हमेशा बनी रहती है।
जवाब और कार्रवाई की प्रतीक्षा में जनता
रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था आज केवल अस्पतालों का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह जनता के भरोसे, सरकारी जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन चुकी है।
एक जिम्मेदार मीडिया मंच के रूप में जनभावनाओं, चर्चाओं और उठते सवालों को प्रशासन एवं नीति-निर्माताओं तक पहुंचाना आवश्यक है। अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इन सवालों पर स्पष्ट जवाब, निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई के जरिए जनता का भरोसा बहाल कर पाते हैं या नहीं।


