लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ या सत्ता-माफिया का सेतु? पेड न्यूज और विज्ञापनों के बोझ तले दबता जनसरोकार
भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को सदैव ‘चौथा स्तंभ’ कहा गया है। यह वह शक्ति मानी गई, जिसका दायित्व सरकारों पर निगरानी रखना, सत्ता से सवाल करना और जनता की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाना था। वर्ष 1947 में देश की स्वतंत्रता और 1950 में संविधान लागू होने के बाद एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह प्रेस की परिकल्पना की गई थी। उम्मीद यह थी कि मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी बनेगा, लेकिन सात दशक बाद देश का बड़ा मीडिया परिदृश्य एक गंभीर बहस के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है।
आज प्रश्न यह उठने लगा है कि क्या मीडिया अब भी लोकतंत्र का प्रहरी है, या फिर सत्ता, कॉरपोरेट हितों और विभिन्न प्रकार के माफियाओं के बीच एक प्रभावशाली ‘सेतु’ बन चुका है?
जनसरोकार बनाम विज्ञापन का साम्राज्य
वर्तमान समय में मीडिया संस्थानों की आर्थिक संरचना बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर निर्भर हो चुकी है। सरकारी विज्ञापन, निजी कंपनियों के पैकेज, कॉर्पोरेट प्रायोजन और कथित ‘मैनेजमेंट डील’ अब मीडिया संचालन का प्रमुख आधार बनते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रभाव खबरों की निष्पक्षता पर देखने को मिलता है।
जानकारों का मानना है कि जब खनन, शराब, परिवहन, भू-माफिया या अन्य प्रभावशाली समूह किसी मीडिया संस्थान को भारी आर्थिक पैकेज देते हैं, तो अक्सर उनकी गतिविधियों से जुड़े गंभीर सवाल दब जाते हैं। कई मामलों में जनहित के मुद्दे पन्नों और स्क्रीन से गायब होने लगते हैं, जबकि प्रचारात्मक सामग्री प्रमुख स्थान पाने लगती है।
इसी तरह सरकारें भी विभिन्न योजनाओं, उपलब्धियों और अभियानों के नाम पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन जारी करती हैं। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सूचना तंत्र का हिस्सा जरूर है, लेकिन सवाल तब खड़े होते हैं जब विज्ञापन निर्भरता खबरों की स्वतंत्रता को प्रभावित करने लगे।
‘पेड न्यूज’ का बढ़ता खतरा
भारतीय पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ‘पेड न्यूज’ की प्रवृत्ति है। पैसे, प्रभाव या राजनीतिक लाभ के बदले खबरों के स्वरूप को प्रभावित करने की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं। कई बार खबर और विज्ञापन की सीमा इतनी धुंधली हो जाती है कि आम पाठक वास्तविक सूचना और प्रायोजित सामग्री में अंतर ही नहीं कर पाता।
चुनावी मौसम में यह प्रवृत्ति और अधिक चर्चा में रहती है, जहां सकारात्मक छवि निर्माण या विरोधियों को कमजोर दिखाने के लिए कथित तौर पर प्रायोजित सामग्री प्रसारित किए जाने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
डिजिटल क्रांति ने बदली मीडिया की दिशा
पिछले एक दशक में सूचना जगत में सबसे बड़ा बदलाव डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के रूप में सामने आया है। अब बड़ी संख्या में लोग खबरों के लिए केवल अखबारों और टीवी चैनलों पर निर्भर नहीं हैं। यूट्यूब चैनल, डिजिटल पोर्टल, सोशल मीडिया पेज और स्वतंत्र पत्रकारिता प्लेटफॉर्म तेजी से प्रभावी हो रहे हैं।
इस बदलाव ने मुख्यधारा मीडिया के एकाधिकार को चुनौती दी है। छोटे स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल मंच ऐसे मुद्दों को सामने ला रहे हैं, जिन्हें कभी-कभी बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि डिजिटल क्षेत्र में भी फर्जी खबरें, अपुष्ट दावे और राजनीतिक एजेंडे जैसी चुनौतियां कम नहीं हैं।
क्या मीडिया भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का माध्यम बन रहा है?
देश के कई हिस्सों में समय-समय पर यह आरोप उठते रहे हैं कि कुछ मीडिया संस्थान प्रशासनिक अनियमितताओं, अवैध कारोबार, खनन, राजस्व, परिवहन और स्थानीय भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष भूमिका निभाने के बजाय प्रभावशाली समूहों के हितों के अनुरूप काम करते हैं।
सवाल यह है कि यदि पत्रकारिता सत्ता से प्रश्न पूछने के बजाय केवल प्रशंसा का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी? विडंबना यह भी है कि जो मीडिया संस्थान सत्ता परिवर्तन से पहले एक विचारधारा के पक्षधर दिखते हैं, वही राजनीतिक समीकरण बदलते ही दूसरी दिशा में खड़े नजर आते हैं।
विपक्ष की जिम्मेदारी और नीति आधारित सुधार
राजनीतिक दलों के बीच अक्सर ‘गोदी मीडिया’ या पक्षपाती पत्रकारिता जैसे आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता मीडिया पारदर्शिता, विज्ञापन नीति में सुधार, संपादकीय स्वतंत्रता और जवाबदेही के स्पष्ट मानकों की है।
यदि सरकारी विज्ञापनों का वितरण निष्पक्ष, पारदर्शी और निर्धारित मानकों के अनुसार हो, तो कथित पक्षपात की आशंकाएं कम हो सकती हैं। साथ ही प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करना भी समय की मांग है।
जनता की जागरूकता ही सबसे बड़ी ताकत
लोकतंत्र में मीडिया उतना ही प्रभावशाली होता है, जितना जनता उसे स्वीकार करती है। पाठकों, दर्शकों और डिजिटल उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि लोग तथ्य आधारित पत्रकारिता को प्राथमिकता दें, अपुष्ट खबरों से बचें और निष्पक्ष मीडिया को समर्थन दें, तो पत्रकारिता की गुणवत्ता में सुधार संभव है।
आज जरूरत केवल मीडिया की आलोचना करने की नहीं, बल्कि ऐसे वातावरण के निर्माण की है जहां पत्रकारिता सत्ता से सवाल पूछ सके, भ्रष्टाचार को उजागर कर सके और बिना किसी दबाव के जनसरोकारों को प्राथमिकता दे सके।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब उसकी नींव जनविश्वास, निष्पक्षता और निर्भीकता पर टिकी होगी। अन्यथा विज्ञापनों, पैकेजों और प्रभावों के बोझ तले दबकर उसकी विश्वसनीयता लगातार कमजोर होती जाएगी।

