विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘उत्सव’ बनाम धरातल की सच्चाई: करोड़ों के वृक्षारोपण के बाद भी रीवा-मऊगंज क्यों हो रहे बंजर?
5 जून को पौधारोपण की तस्वीरें, लेकिन सालभर गायब हरियाली—जनता पूछ रही, आखिर जंगल गए कहां?
विशेष रिपोर्ट | रीवा-मऊगंज मध्यप्रदेश
5 जून 2026 को पूरे देश सहित रीवा और मऊगंज जिले में विश्व पर्यावरण दिवस बड़े उत्साह और औपचारिक आयोजनों के साथ मनाया गया। शासकीय विभागों, निजी संस्थानों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए। फोटो खिंचीं, भाषण हुए, पर्यावरण संरक्षण के संकल्प लिए गए और हरियाली बचाने के संदेश दिए गए।
लेकिन इन आयोजनों की चमक-दमक के बीच जनता के मन में एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हो गया—क्या पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन का सरकारी उत्सव बनकर रह गया है?
विश्व पर्यावरण दिवस: उद्देश्य बड़ा, लेकिन क्या प्रयास ईमानदार?
विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी। भारत में इसका आयोजन 5 जून 1973 से किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्रकृति संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित करना था।
बीते पांच दशकों में देश और प्रदेश में कई सरकारें आईं और गईं। हर सरकार ने वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास के बड़े-बड़े दावे किए। करोड़ों नहीं बल्कि अरबों रुपये की योजनाएं बनीं। केवल मध्यप्रदेश के रीवा और मऊगंज जैसे जिलों में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये वृक्षारोपण और वन संरक्षण योजनाओं के नाम पर खर्च होने के दावे किए जाते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हुआ है, तो धरातल पर उसकी तस्वीर आखिर क्यों नहीं दिखाई देती?
पांच साल के पौधे कहां हैं?
ग्रामीण क्षेत्रों, सड़क किनारों, पहाड़ी इलाकों और सार्वजनिक भूमि पर यदि पिछले पांच वर्षों में किए गए वृक्षारोपण की वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण कराया जाए, तो शायद तस्वीर चौंकाने वाली हो सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कागजों में लाखों पौधे रोपे जाने के दावे होते हैं, लेकिन वास्तविकता में उनमें से बहुत कम वृक्ष जीवित दिखाई देते हैं। यदि सरकारी आंकड़ों के अनुसार पौधारोपण वास्तव में सफल हुआ होता, तो मध्यप्रदेश के अनेक क्षेत्र घने जंगलों में परिवर्तित होते दिखाई देते।
विडंबना यह है कि जिन पहाड़ियों और जंगलों में पहले प्राकृतिक हरियाली थी, आज वहां भी वृक्षों की संख्या तेजी से घटती नजर आ रही है।
राष्ट्रीय राजमार्गों की ‘सूनी पट्टी’: वादे कहां गए?
रीवा-मऊगंज क्षेत्र से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-30 और राष्ट्रीय राजमार्ग-135 के किनारे वृक्षारोपण को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय जनचर्चा के अनुसार सड़क चौड़ीकरण के दौरान बड़ी संख्या में पुराने वृक्ष काटे गए थे। पर्यावरणीय नियमों के तहत कटे वृक्षों के बदले कई गुना पौधारोपण किया जाना था।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर आज तक उन मार्गों की पट्टियों पर अपेक्षित स्तर का वृक्षारोपण क्यों दिखाई नहीं देता? जांच की बातें होती हैं, दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर हरियाली की जगह धूल और सूनी जमीन दिखाई देती है।
वृक्षारोपण या ठेकेदारी व्यवस्था?
क्षेत्र में यह चर्चा भी लंबे समय से बनी हुई है कि वृक्षारोपण से जुड़े कार्यों का लाभ सीमित समूहों तक पहुंच रहा है। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन जनता लगातार पारदर्शिता की मांग कर रही है कि आखिर किन एजेंसियों, ठेकेदारों या व्यक्तियों को इन योजनाओं का कार्य मिला और उनकी जवाबदेही क्या तय की गई?
यदि पौधे लगाए गए, तो उनकी निगरानी किसने की? कितने पौधे जीवित हैं? और करोड़ों रुपये के खर्च का वास्तविक परिणाम क्या है?
तेजी से गायब हो रहे पेड़: कौन जिम्मेदार?
रीवा और मऊगंज क्षेत्र में आम, महुआ, नीम, पीपल, बरगद, उमर और अन्य पारंपरिक वृक्ष प्रजातियों की संख्या लगातार घटने को लेकर ग्रामीणों में चिंता देखी जा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े-बड़े आम के बगीचे समाप्त होते जा रहे हैं। कई स्थानों पर वन क्षेत्रों से अवैध कटाई की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन माफिया और अवैध कटाई के नेटवर्क के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में वृक्ष समाप्त हो रहे हैं।
यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि जल संकट, तापमान वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी सीधा खतरा है।
ग्राम पंचायतों में क्यों नहीं बना हरित मॉडल?
यदि प्रत्येक ग्राम पंचायत, स्कूल परिसर, सड़क पट्टी और सार्वजनिक भूमि पर व्यवस्थित तरीके से वृक्षारोपण होता और उसकी निगरानी की जाती, तो आज रीवा-मऊगंज क्षेत्र हरित मॉडल के रूप में सामने आ सकता था।
विशेषज्ञों का मानना है कि वृक्षारोपण केवल पौधा लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी पांच वर्षों तक सुरक्षा, सिंचाई और जीवित रहने की जिम्मेदारी तय होना अनिवार्य है।
आंकड़ों में उलझा सच
जनता का एक बड़ा सवाल यह भी है कि राजस्व अभिलेख, खसरा, वन भूमि और वास्तविक वृक्ष संख्या के आंकड़े पारदर्शी रूप से सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? जब तक वास्तविक डेटा सामने नहीं आएगा, तब तक योजनाओं की सफलता और विफलता का निष्पक्ष आकलन संभव नहीं होगा।
अब सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा
पर्यावरण किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव जीवन और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। धर्मग्रंथों से लेकर संविधान तक वृक्षों और प्रकृति संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है।
ऐसे में सवाल केवल सत्ता से नहीं, बल्कि विपक्ष से भी है—क्या पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रहेगा, या धरातल पर जवाबदेही भी तय होगी?
विश्व पर्यावरण दिवस हर साल आता रहेगा, पौधे लगाए जाते रहेंगे, फोटो खिंचती रहेंगी। लेकिन यदि धरातल पर वृक्ष नहीं बचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां शायद पूछेंगी—क्या हमने विकास के नाम पर अपना भविष्य ही काट दिया?

