विकास की अंधी दौड़ में खोखली होती प्रकृति और चरमराती बुनियादी व्यवस्थाएं
स्वतंत्र पत्रकार संजय पांडेय रीवा मऊगंज
आधुनिकता और विकास की वर्तमान परिभाषा ने मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों से स्थापित संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। विकास के बड़े-बड़े दावों और चमकदार परियोजनाओं के बीच वे प्राकृतिक संसाधन लगातार क्षीण होते जा रहे हैं, जिन्हें प्रकृति ने बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों को समान रूप से उपलब्ध कराया था। शुद्ध वायु, स्वच्छ जल, सूर्य की ऊर्जा और हरियाली जैसी जीवनदायिनी संपदाएं आज बाजारवादी सोच और अनियोजित विकास की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन को कृत्रिम रूप से खरीदना पड़े, तो इसकी कीमत सामान्य व्यक्ति की पहुंच से बहुत दूर होगी। इसी प्रकार सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा, जो प्रकृति का निःशुल्क उपहार है, उसे कृत्रिम माध्यमों से प्राप्त करने में भारी खर्च करना पड़ता है। इसके बावजूद प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की अपेक्षा उनके दोहन को प्राथमिकता दी जा रही है। परिणामस्वरूप नदियां सिकुड़ रही हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, पहाड़ों का अस्तित्व खनन गतिविधियों से प्रभावित हो रहा है और जंगलों का क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है।
मंचों पर विकास के नारे, जमीन पर पर्यावरणीय संकट
विकास की उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार बड़े-बड़े मंचों और आयोजनों के माध्यम से किया जाता है। नेताओं और जनप्रतिनिधियों को विकास पुरुष की उपाधियों से नवाजा जाता है तथा विभिन्न योजनाओं की सफलता के दावे किए जाते हैं। किंतु दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने, जल संकट बढ़ने और ग्रामीण जीवन पर पड़ रहे प्रभावों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा है।
मध्य प्रदेश, जो कभी अपने घने जंगलों और प्राकृतिक संपदा के लिए प्रसिद्ध था, आज कई क्षेत्रों में वनक्षेत्रों के सिकुड़ने और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। विकास की योजनाओं के नाम पर वृक्षों की कटाई, खनिज संपदा का दोहन तथा कंक्रीट आधारित निर्माण गतिविधियों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विशेष चिंता का विषय यह है कि पर्यावरणीय प्रभावों के समुचित आकलन और दीर्घकालिक परिणामों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
रीवा-मऊगंज के ग्रामीण अंचलों तक पहुंची विकास परियोजनाएं
रीवा और मऊगंज जिले भी इस परिवर्तन के प्रत्यक्ष साक्षी बन रहे हैं। मणगवां तहसील अंतर्गत हिनौती गदही ग्राम तथा बसामन मामा (सिमरिया) जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न निर्माण और विकास कार्यों की श्रृंखला तेजी से बढ़ रही है। जिन क्षेत्रों में कभी प्राकृतिक वातावरण और ग्रामीण जीवन की सादगी प्रमुख पहचान थी, वहां अब बड़ी परियोजनाओं और निर्माण गतिविधियों का विस्तार देखा जा सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास कार्यों की समीक्षा केवल निर्माण की मात्रा से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर भी की जानी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, भवन और अन्य संरचनाओं का निर्माण निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ जल स्रोतों, कृषि भूमि, वन क्षेत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी के संरक्षण पर भी समान ध्यान दिया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली बनी बड़ी चुनौती
विकास की चर्चा के बीच क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। ग्रामीण अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की कमी, दवाओं का अभाव तथा बुनियादी सुविधाओं की अपर्याप्तता जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। कई स्थानों पर मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि विकास का वास्तविक लाभ आमजन तक पहुंचाना है, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और कृषि जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल निर्माण परियोजनाओं के आधार पर विकास का आकलन करना पर्याप्त नहीं होगा।
विकास और प्रकृति के बीच संतुलन की आवश्यकता
विशेषज्ञों का कहना है कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। आवश्यकता ऐसी विकास नीति की है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। जल, जंगल और जमीन केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी साझा धरोहर हैं।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास की वर्तमान दिशा दीर्घकालिक रूप से समाज और प्रकृति दोनों के लिए हितकारी है? इस प्रश्न पर गंभीर चिंतन और सामाजिक स्तर पर व्यापक संवाद की आवश्यकता है। विकास परियोजनाओं का सामाजिक एवं पर्यावरणीय ऑडिट समय-समय पर किया जाना चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक उपयोगिता और प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके।

