मऊगंज में आबकारी की कथित ‘मेहरबानी’ से फल-फूल रहा अवैध शराब का साम्राज्य, सरकार को करोड़ों के राजस्व नुकसान का अंदेशा
रीवा-मऊगंज में 2000 से अधिक अवैध पाइकारी केंद्रों के संचालन का दावा, सीमावर्ती क्षेत्रों में यूपी शराब की तस्करी से बढ़ी चुनौती
स्वतंत्र पत्रकार संजय पांडेय रीवा/मऊगंज।
विंध्य क्षेत्र के प्रमुख जिलों में शामिल रीवा और नवगठित मऊगंज इन दिनों विकास योजनाओं से अधिक कथित अवैध शराब कारोबार को लेकर चर्चाओं में हैं। क्षेत्र में लगातार उठ रहे सवाल, स्थानीय लोगों की शिकायतें और विभिन्न सूत्रों से मिल रही जानकारियां इस ओर संकेत कर रही हैं कि दोनों जिलों में शराब की अवैध पाइकारी, अंतरजिला परिवहन और सीमापार तस्करी का नेटवर्क तेजी से विस्तार कर रहा है। यदि इन दावों में तथ्यात्मक आधार है तो यह केवल राजस्व हानि का विषय नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मामला भी हो सकता है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि आबकारी विभाग की निगरानी व्यवस्था अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पा रही है। कई लोगों का आरोप है कि कार्रवाई की गति और जमीनी नियंत्रण के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, जिसके कारण अवैध कारोबारियों के हौसले बुलंद हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और विभाग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।
2000 से अधिक अवैध पाइकारी केंद्रों के संचालन का दावा
क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार रीवा और मऊगंज जिले में दो हजार से अधिक अवैध शराब पाइकारी केंद्र संचालित होने की चर्चा है। गांवों, कस्बों और बाजार क्षेत्रों में छोटे स्तर पर विकसित हुए कथित नेटवर्क ने अवैध शराब बिक्री को संगठित स्वरूप दे दिया है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि अनेक बेरोजगार युवाओं को इस कारोबार से जोड़कर प्रतिदिन दो से तीन हजार रुपये तक की कमाई कराई जा रही है। यद्यपि इन दावों का कोई अधिकृत सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन क्षेत्र में खुलेआम हो रही कथित गतिविधियां प्रशासनिक निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न अवश्य खड़े करती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब बिक्री के केंद्रों की निष्पक्ष गणना कराई जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। उनका मानना है कि यह नेटवर्क केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सामाजिक विघटन और अपराध वृद्धि का कारण भी बन रहा है।
गढ़-कटरा की कार्रवाई ने खोली कथित नेटवर्क की परतें
हाल ही में रीवा जिले के गढ़ थाना क्षेत्र अंतर्गत कटरा इलाके में आबकारी विभाग और पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के बाद अवैध शराब नेटवर्क को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि रीवा जिले से शराब उठाकर मऊगंज जिले के नईगढ़ी, देवतालाब तथा अन्य ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाई जाती है।
जानकारों के अनुसार इस कथित नेटवर्क में शराब को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए दोपहिया और चारपहिया वाहनों का उपयोग किया जाता है। छोटे-छोटे खेपों में परिवहन होने के कारण कार्रवाई एजेंसियों के लिए पूरे नेटवर्क तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि कम कीमत पर खरीदी गई शराब को अवैध केंद्रों तक पहुंचाकर अधिक दरों पर बेचा जाता है, जिससे कारोबारियों को भारी लाभ प्राप्त होता है। यदि यह व्यवस्था बड़े स्तर पर संचालित हो रही है तो इससे सरकार के वैध राजस्व संग्रह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
उत्तर प्रदेश सीमा से सटे क्षेत्रों में तस्करी की बढ़ती चुनौती
रीवा और मऊगंज जिले की भौगोलिक स्थिति प्रशासन के लिए अतिरिक्त चुनौती पैदा करती है। उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे होने के कारण सीमावर्ती मार्ग लंबे समय से निगरानी का विषय रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दोनों राज्यों में शराब की कीमतों के अंतर का लाभ उठाकर कुछ संगठित समूह कथित तस्करी को बढ़ावा दे रहे हैं। आरोप हैं कि सीमावर्ती ग्रामीण मार्गों और संपर्क सड़कों के माध्यम से शराब की खेपें विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाई जाती हैं।
सूत्रों का दावा है कि इस अवैध कारोबार में प्रतिदिन लाखों रुपये का लेन-देन होता है। यदि इन दावों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल राजस्व चोरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संगठित अपराध और प्रशासनिक नियंत्रण की प्रभावशीलता से भी जुड़ जाएगा।
‘सफेदपोश संरक्षण’ की चर्चाएं, लेकिन सार्वजनिक तथ्य नहीं
क्षेत्र में यह चर्चा भी समय-समय पर सामने आती रही है कि अवैध शराब कारोबार को कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण प्राप्त हो सकता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही किसी सक्षम एजेंसी द्वारा अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसे आरोपों की पुष्टि की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शराब कारोबार में बड़े आर्थिक हित जुड़े होने के कारण विभिन्न स्तरों पर प्रभाव का इस्तेमाल किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में पारदर्शी और निष्पक्ष जांच ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
कार्रवाई केवल छोटे खिलाड़ियों तक सीमित क्यों?
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भी अवैध शराब की खेप पकड़ी जाती है, तब कार्रवाई अक्सर परिवहनकर्ता, चालक या छोटे विक्रेताओं तक ही सीमित क्यों दिखाई देती है। आखिर शराब का मूल स्रोत क्या है और वह किस आपूर्ति श्रृंखला से निकलकर अवैध बाजार तक पहुंचती है, इसकी गहन जांच कितनी बार की जाती है?
जानकारों का कहना है कि प्रत्येक वैध शराब बोतल पर बैच नंबर, बारकोड और आपूर्ति संबंधी जानकारी दर्ज होती है। तकनीकी रूप से इन विवरणों के आधार पर स्रोत तक पहुंचना संभव है। इसके बावजूद बड़े नेटवर्क तक कार्रवाई का दायरा सीमित रहने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
सरकार को करोड़ों के राजस्व नुकसान की आशंका
वित्तीय दृष्टि से देखा जाए तो अवैध शराब कारोबार का सबसे बड़ा प्रभाव सरकारी राजस्व पर पड़ता है। जब शराब वैध बिक्री चैनल से बाहर जाकर अवैध नेटवर्क के माध्यम से बिकती है तो आबकारी शुल्क और अन्य करों की संभावित हानि होती है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि यदि रीवा और मऊगंज में अवैध पाइकारी के दावे सही साबित होते हैं तो सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक नुकसान का आकलन केवल अधिकृत जांच और वित्तीय ऑडिट के बाद ही संभव है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि रीवा-मऊगंज क्षेत्र में अवैध शराब कारोबार के संबंध में उठ रहे सवालों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, लाइसेंसी दुकानों की नियमित ऑडिट, परिवहन मार्गों की सतत निगरानी तथा सूचना तंत्र को मजबूत बनाकर ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान संभव है।
अब देखना यह होगा कि लगातार उठ रहे सवालों और स्थानीय स्तर पर बढ़ती चर्चाओं के बीच प्रशासन एवं आबकारी विभाग किस प्रकार की ठोस कार्रवाई करते हैं। क्योंकि यदि अवैध शराब कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो इसका असर केवल सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

