जल संरक्षण से समृद्ध खेती की ओर बढ़े किसान: जल गंगा संवर्धन अभियान के समापन पर आत्मा चौपाल में मिली वैज्ञानिक खेती की सीख
रीवा। जिले में "किसान कल्याण वर्ष-2026" के अंतर्गत कलेक्टर एवं उपसंचालक कृषि, रीवा के निर्देशन में संचालित जल गंगा संवर्धन अभियान एवं खेत बचाओ अभियान के समापन अवसर पर विकासखंड गंगेव के ग्राम भौखरीखुर्द एवं सेंदहा में आत्मा परियोजना के तहत आत्मा चौपाल, जल गोष्ठी एवं मिलेट फसलों पर क्षमता विकास प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा जलवायु अनुकूल आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़कर खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाना था।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी गंगेव शिवसरण सरल, बीटीएम आत्मा परियोजना दीपक कुमार श्रीवास्तव, कृषि विस्तार अधिकारी सुधांशु शुक्ला सहित विभिन्न ग्रामों से बड़ी संख्या में प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। अधिकारियों ने किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने, मृदा की उर्वरा शक्ति बनाए रखने तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के महत्व की विस्तृत जानकारी दी। साथ ही वर्तमान मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए आकस्मिक कृषि योजना के अंतर्गत धान की डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) पद्धति से खेती करने के वैज्ञानिक तरीके समझाए गए, जिससे कम पानी में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
बीटीएम आत्मा परियोजना दीपक कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि अभियान के दौरान किसानों को ई-विकास प्रणाली के माध्यम से मृदा परीक्षण आधारित संतुलित एवं विवेकपूर्ण उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इससे खेती की लागत में कमी आने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति भी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। उन्होंने वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली तथा जल के वैज्ञानिक एवं कुशल प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि भविष्य की खेती जल संरक्षण पर आधारित होगी।
कार्यक्रम में किसानों को दलहन एवं तिलहन फसलों का रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, ताकि किसानों की आय में वृद्धि होने के साथ देश के आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती मिल सके। साथ ही खेतों में हरी खाद के उपयोग से जैविक कार्बन बढ़ाने, मृदा की गुणवत्ता सुधारने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लाभों की विस्तृत जानकारी दी गई।
वर्तमान में कम वर्षा एवं लंबे शुष्क काल की स्थिति को देखते हुए किसानों को मिलेट फसलों विशेषकर कोदो एवं रागी की वैज्ञानिक खेती अपनाने की सलाह दी गई। अधिकारियों ने बताया कि ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं तथा पोषण और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी हैं। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच मोटे अनाज किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रहे हैं।
कार्यक्रम के समापन पर कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना द्वारा किसानों से अपील की गई कि वे मौसम की सटीक एवं समय पर जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने मोबाइल फोन में मौसम ऐप, दामिनी ऐप एवं मेघदूत ऐप डाउनलोड कर नियमित रूप से उनका उपयोग करें। अधिकारियों ने कहा कि वैज्ञानिक सलाह, आधुनिक तकनीक और जल संरक्षण के उपायों को अपनाकर किसान खेती को अधिक सुरक्षित, लाभकारी एवं टिकाऊ बना सकते हैं।


