रीवा मध्यप्रदेश
धान खरीदी वर्ष 2024-25: भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की भेंट चढ़ी सरकारी योजनाएं
रीवा मऊगंज जिले में धान खरीदी का उद्देश्य किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाना और कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करना है। लेकिन इस वर्ष भी, सरकारी घोषणाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ती नजर आ रही हैं। किसानों, व्यापारियों, और अधिकारियों के गठजोड़ ने इस प्रक्रिया को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है।
समस्या की शुरुआत: सरकारी नियमों की अनदेखी
धान खरीदी केंद्रों पर सरकारी नियमों का पालन न के बराबर हो रहा है।
किसानों को अपने धान की सफाई और तोल के लिए खुद शुल्क देना पड़ रहा है।
केंद्रों पर धान की गुणवत्ता की जांच नाममात्र की हो रही है।
₹100 प्रति कुंटल का लाभ देने की योजना का दुरुपयोग किया जा रहा है, जहां व्यापारी और किसान मिलकर कचरा युक्त और निम्न गुणवत्ता का धान बेच रहे हैं।
खरीदी केंद्रों पर अनियमितताएं
1. बिना पद के लोगों का हस्तक्षेप:
सिमरिया और गदलौरी मंडी में एक चौकीदार की मनमानी ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह चौकीदार, जो उचित मूल्य की दुकान का विक्रेता भी है, धान खरीदी में मनमानी तरीके से ट्रैक्टर नंबर लगाने और पैसे वसूलने में शामिल पाया गया।
पिछले वर्ष अपशब्द बोलने और वीडियो वायरल होने के बावजूद उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
2. झूठी बोरियों और लूज धान का खेल:
40 किलो की बोरी में केवल 35-38 किलो धान भरा जा रहा है।
लूज धान (बिना बोरी का) का कोई रिकॉर्ड या पंचनामा खरीदी केंद्र पर उपलब्ध नहीं है।
यह स्पष्ट नहीं है कि ये धान किन किसानों का है और इसका दाम किसे मिल रहा है।
3. गोदामों में धान का भंडारण और गड़बड़ी:
गोदाम प्रभारी और ठेकेदारों की मिलीभगत से निम्न गुणवत्ता का धान भंडारित हो रहा है।
पिछले वर्ष देवघर क्षेत्र के एक गोदाम में ऐसी ही गड़बड़ी पकड़ी गई थी।
4. खरीदी केंद्रों पर स्थान और व्यवस्था की कमी:
किसानों को धान उतारने और साफ करने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं दिया जा रहा।
कई किसान सुविधा के अभाव में खुद शुल्क देकर धान साफ-सुथरा करवा रहे हैं।
शिकायतों पर प्रशासन की निष्क्रियता
इस पूरे भ्रष्टाचार के बावजूद, कृषि विभाग, सहकारिता विभाग, खाद्य विभाग, नागरिक आपूर्ति निगम, और सहकारी बैंक जैसे कई बड़े विभागों की मौजूदगी के बावजूद अनियमितताओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
किसानों और व्यापारियों की शिकायतें बार-बार नजरअंदाज की जा रही हैं।
निरीक्षण के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारी गड़बड़ियों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
40 किलो की बोरी में 35-38 किलो धान का भरा जाना एक खुला सच है, लेकिन कोई इसे गंभीरता से नहीं ले रहा।
भ्रष्टाचार की परतें:
1. गुणवत्ता-विहीन धान को ₹1000 प्रति कुंटल के हिसाब से खरीदा जा रहा है।
2. केंद्रों पर रिश्वत और भ्रष्टाचार का सिलसिला खुलेआम चल रहा है।
3. खरीदी केंद्रों पर लूट और मनमानी की घटनाएं गुलामी के युग की याद दिलाती हैं।
समाचार पत्रों ने दी थी चेतावनी
धान खरीदी शुरू होने से 15 दिन पहले ही समाचार पत्रों ने इन समस्याओं की ओर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। यदि प्रशासन ने समय पर कार्रवाई की होती, तो इन अनियमितताओं को रोका जा सकता था।
समाज और किसान पर प्रभाव
इस पूरे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
किसान अपनी मेहनत का सही दाम पाने से वंचित हो रहे हैं।
खरीदी प्रक्रिया में होने वाली लूट ने किसानों को निराश किया है।
प्रशासनिक निष्क्रियता ने किसानों का भरोसा तोड़ दिया है।
इस वर्ष की धान खरीदी प्रक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल योजनाएं बनाना ही पर्याप्त नहीं है, उनका सही क्रियान्वयन और निगरानी भी जरूरी है।
1. खरीदी केंद्रों पर सख्त निगरानी: प्रशासन को सभी केंद्रों पर नियमित और सख्त निरीक्षण करना चाहिए।
2. कर्मचारियों की जवाबदेही: केंद्र प्रभारी, गोदाम प्रभारी, और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
3. किसानों की शिकायतों का समाधान: शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और समय पर कार्रवाई हो।
4. डिजिटलीकरण और पारदर्शिता: पूरी प्रक्रिया को डिजिटल किया जाए, ताकि हर कदम पर पारदर्शिता बनी रहे।


