रीवा और मऊगंज में खाद्य विभाग की गुणवत्ता जांच कार्यवाही संदेह के घेरे में
निरीक्षण में अनियमितताएँ, सतही जांच और देरी से कार्रवाई पर उठे सवाल
रीवा और मऊगंज में खाद्य विभाग की विशेष टीम द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग पर संचालित होटलों और ढाबों पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच का अभियान चलाया गया। इस कार्यवाही का उद्देश्य मिलावटी और खराब खाद्य सामग्री की पहचान करना था, लेकिन विभाग की मंशा और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आँखों से जांच, लैब टेस्ट की उपेक्षा
खाद्य विभाग के अधिकारी कई होटलों और ढाबों पर खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को केवल आँखों से देखकर जांचने का दावा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी खाद्य सामग्री में मिलावट या अशुद्धि की सटीक जानकारी केवल लैब टेस्ट से ही प्राप्त की जा सकती है। इस तरह की सतही जांच से संदेह पैदा होता है कि कहीं यह कार्यवाही केवल खानापूर्ति तो नहीं?
एक्सपायरी सामान की खुली बिक्री, फिर भी कार्रवाई नहीं
स्थानीय दुकानों और किराना व्यापारियों से खरीदी जाने वाली खाद्य सामग्रियों में एक्सपायरी सामान खुलेआम बेचे जाने की शिकायतें आम हैं। मसाले, बिस्किट, नमकीन, तेल और अन्य खाद्य सामग्री की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। सवाल यह उठता है कि जब आम व्यक्ति को आसानी से एक्सपायरी सामान मिल सकता है, तो खाद्य विभाग इस पर सख्त कदम क्यों नहीं उठा रहा?
बिना लाइसेंस के ढाबों पर कार्रवाई, लेकिन देरी क्यों?
खाद्य विभाग द्वारा बिना लाइसेंस संचालित ढाबों और होटलों पर कार्रवाई की गई है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह उठता है कि ये ढाबे वर्षों से संचालित हो रहे थे, तब प्रशासन ने पहले कदम क्यों नहीं उठाया? क्या जिला प्रशासन को इनकी जानकारी नहीं थी, या इसे नजरअंदाज किया जा रहा था? यदि अब यह कार्रवाई हो रही है, तो यह देर से उठाया गया कदम क्यों माना जाए?
खाद्य आपूर्ति चेन पर उठे सवाल
इन ढाबों और होटलों में उपयोग की जाने वाली खाद्य सामग्री—सब्जियाँ, दाल, मसाले, पनीर और पानी—कहाँ से आ रही हैं? खाद्य विभाग के जांच अधिकारी द्विवेदी द्वारा उन दुकानदारों पर भी कार्रवाई की जा रही है, जो इन ढाबों को सामान सप्लाई कर रहे थे। चर्चा है कि एक ही सप्लायर कई होटलों को मिलावटी सामग्री दे रहा था। यदि ऐसा है, तो क्या प्रशासन इस सप्लायर पर कोई सख्त कदम उठाएगा?
अन्य विभागों पर भी लगे आरोप
रीवा जिले में भ्रष्टाचार केवल खाद्य विभाग तक सीमित नहीं है। हाल ही में एक ड्रग इंस्पेक्टर का रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल हुआ था। इसके अलावा, परिवहन विभाग, वन विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस थानों में भी रिश्वतखोरी के आरोप लगे हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या प्रशासन केवल छोटे दुकानदारों और ढाबों पर कार्रवाई कर रहा है, जबकि बड़े भ्रष्टाचारियों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
क्या सरकार की नीतियों के अनुरूप हो रहा कार्य?
मुख्यमंत्री मोहन यादव और जिला कलेक्टर प्रतिभा पाल की भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था की मंशा के बावजूद, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। प्रशासन को इस मामले में निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए और ईमानदार अधिकारियों को बेवजह बदनाम होने से बचाना चाहिए।अब देखना यह है कि शासन इन अनियमितताओं पर क्या कदम उठाता है और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।

