धर्म, आस्था और शोषण: कुंभ मेले में लूट-खसोट पर प्रशासन की चुप्पी क्यों?
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश 19 फरवरी 2025)
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संविधान सर्वोच्च है, लेकिन समाज कई बार उससे आगे बढ़कर अपनी परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार कार्य करता है। चाहे वह दान-पुण्य हो, जरूरतमंदों की सहायता हो या धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना हो, समाज संविधान से ज्यादा उदारता दिखाता है।
लेकिन जब धार्मिक आयोजनों की बात आती है, तो आस्था के नाम पर अनैतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। इसी संदर्भ में मध्य प्रदेश के रीवा जिले, जो राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित है, से आई खबरें बेहद चिंताजनक हैं। प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ के दौरान श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए होटल और ढाबा संचालकों ने रहने और खाने के दामों में कई गुना वृद्धि कर दी है, जिससे आम जनता को भारी आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है।
रीवा में होटल और ढाबों में लूट का खेल
रीवा जिले में कुंभ मेले के दौरान हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं। लेकिन यहां की होटल और ढाबा व्यवस्था आम जनता के लिए एक नई मुसीबत बन गई है। शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक ठहरने और भोजन के दाम आसमान छू रहे हैं।
सिर्फ 2 घंटे ठहरने का किराया ₹7,000 तक लिया जा रहा है।
अगर कोई यात्री 10 घंटे रुकता है, तो उसे ₹14,000 तक भुगतान करना पड़ रहा है।
बोतलबंद पानी, जो आमतौर पर थोक में 7 से 10 रुपए प्रति लीटर मिलता है, उसे ₹30-₹50 प्रति लीटर बेचा जा रहा है।
₹8 में खरीदा गया रसगुल्ला ₹20-₹30 में बेचा जा रहा है।
यह साफ दर्शाता है कि होटल और ढाबा संचालक श्रद्धालुओं की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं और प्रशासन इस पर आंख मूंदे बैठा है।
अव्यवस्था और प्रशासनिक संरक्षण
राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर, रीवा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर तक, सैकड़ों होटल और ढाबे स्थित हैं। कुछ स्थानों पर ठहरने की सुविधा ग्रामीण इलाकों में भी उपलब्ध है, लेकिन वहां भी दाम आसमान छू रहे हैं।
राष्ट्रीय राज्यमार्ग 30 ग्रामीण अंचलों का सबसे महंगा ठहराने की व्यवस्था जिला मुख्यालय से सामान्य होटल मुंबई और दिल्ली से भी महंगा है। पानी का थोक में प्रति लीटर 7 रुपए से 10 तक है। अलग अलग कंपनी के रेट अलग होता है।
सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि:
1. क्या होटल और ढाबों को लाइसेंस देते समय नियमों का पालन किया गया?
2. क्या होटल संचालकों द्वारा किराए में असाधारण वृद्धि की जानकारी प्रशासन को दी गई?
3. क्या ठहरने वाले यात्रियों का रिकॉर्ड रखा जा रहा है और उनकी सूचना पुलिस को दी जा रही है?
4. क्या प्रशासन ने होटल मालिकों को नियमों की अनदेखी करने की छूट दे रखी है?
अगर प्रशासन की ओर से कड़ा नियंत्रण होता, तो इस तरह की मनमानी नहीं होती। यह सवाल भी उठता है कि क्या बिना प्रशासनिक संरक्षण के इतनी खुली लूट संभव है? यदि अधिकारियों की मिलीभगत नहीं होती, तो होटल संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अब तक हो चुकी होती।
सुरक्षा के लिए भी खतरा
होटल और ढाबों में मनमानी की यह स्थिति सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक हो सकती है। जब प्रशासन इस बात का ध्यान नहीं रख रहा कि कौन-कौन ठहर रहा है, तो शरारती तत्व और अपराधी भी इन होटलों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
क्या हर यात्री की जानकारी पुलिस को दी जा रही है?
क्या होटल संचालकों को यात्रियों की पहचान जांचने की अनिवार्यता से छूट मिल गई है?
क्या प्रशासन के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से यह खेल चल रहा है?
अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह गंभीर सुरक्षा संकट भी पैदा कर सकता है।
राजनीति और सरकारी उदासीनता
सरकार और विपक्ष दोनों को इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए। प्रशासन की उदासीनता और भ्रष्टाचार की वजह से आम जनता को आर्थिक और मानसिक शोषण झेलना पड़ रहा है। यह आवश्यक है कि—
होटल किराए की अधिकतम सीमा तय की जाए और उसका सख्ती से पालन कराया जाए।
खाद्य पदार्थों और पानी की कीमतों पर नियंत्रण रखा जाए।
हर यात्री का रिकॉर्ड रखा जाए और पुलिस को जानकारी दी जाए।
प्रशासनिक मिलीभगत की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
रीवा जिले में कुंभ मेले के दौरान होटल और ढाबों में हुई इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक आस्था के नाम पर आम जनता का शोषण किया जा रहा है। प्रशासन की निष्क्रियता और भ्रष्टाचार ने होटल और ढाबा संचालकों को बेखौफ बना दिया है।
आस्था के नाम पर श्रद्धालुओं से लूट-खसोट की यह प्रवृत्ति चाहिए कि वह तत्काल इस पर ध्यान दे और उचित नीतियां बनाकर जनता को इस शोषण से बचाए। समाज भले ही संविधान से आगे बढ़कर कई काम करता है, लेकिन जब भ्रष्टाचार और अनैतिक लाभ की बात आती है, तो इसे नियंत्रित करने के लिए प्रशासन और कानून को ही अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।


