कुंभ में सरकार और समाजसेवी संगठनों की तत्परता, लेकिन खाद्य विभाग की उदासीनता पर उठ रहे सवाल
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश 13 फरवरी 2025)
कुंभ मेला, जिसे आस्था और विश्वास का महापर्व कहा जाता है, इस बार भी भव्यता के साथ जारी है। मध्य प्रदेश सरकार से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक इस आयोजन को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री से लेकर संभागीय आयुक्त, जिला कलेक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारी यात्रियों की सुविधा और व्यवस्था सुनिश्चित करने में संलग्न हैं। इसके अलावा, विभिन्न राजनीतिक दल—चाहे वह कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी, या फिर अन्य सामाजिक संगठन—सभी यात्रियों को भोजन, पानी और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। किंतु दुकानों होटलों सहित ढाबों में रेट सूची वाहन पार्किंग की व्यवस्था का अभाव है। किंतु राष्टीय राज्य मार्ग के किनारे संचालित ढाबाओ को किस गाइड लाइन के तहत संचालित करने की खुली झूठ प्रदान है।
हजारों कुंटल खाद्य पदार्थों का निशुल्क वितरण, लेकिन निगरानी का अभाव
अब तक इस माघ मेले में हजारों कुंटल खाद्य सामग्री तैयार कर यात्रियों के बीच निशुल्क वितरित की जा चुकी है। सरकार और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा किए जा रहे इन प्रयासों से यात्रियों को बड़ी राहत मिली है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतनी विशाल मात्रा में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता की जांच और इसकी उचित दरों पर उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
मध्य प्रदेश खाद्य विभाग की भूमिका इस संदर्भ में संदेह के घेरे में आ रही है। यात्रियों और श्रद्धालुओं के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि क्या खाद्य विभाग रीवा से लेकर चाकघाट तक इस पूरे क्षेत्र में रेट लिस्ट की जांच कर रहा है? क्या भोजन की गुणवत्ता की निगरानी हो रही है? क्या स्वास्थ्य विभाग और खाद्य विभाग की संयुक्त टीम नियमित निरीक्षण कर रही है?
कालाबाजारी और महंगे दामों पर बिक्री— खाद्य विभाग की लापरवाही या मिलीभगत?
खाद्य पदार्थों की कालाबाजारी और बिना लाइसेंस के संचालित दुकानों की संख्या बढ़ रही है। स्वास्थ्य मानकों का पालन न करने वाले कई ठेले-गुमटी और अस्थायी दुकानें यात्रियों को बीमारियों के जोखिम में डाल रही हैं। इन स्थितियों को देखते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन इन अनियमितताओं पर कठोर कार्यवाही करेगा?
सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं की सार्थकता पर सवाल
वर्तमान सरकार स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का दावा कर रही है। जगह-जगह स्वास्थ्य शिविर लगाए जा रहे हैं ताकि यात्रियों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लेकिन जब खुलेआम मिलावटी और महंगे खाद्य पदार्थ बेचे जा रहे हों, जब बिना स्वच्छता मानकों का पालन किए भोजन तैयार किया जा रहा हो, तो सरकार की स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं कितनी प्रभावी साबित होंगी?
यदि सरकार अपनी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाना चाहती है, तो उसे ऐसे व्यवसायियों और अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी, जो यात्रियों की असुविधा के बावजूद अपने स्वार्थ के लिए नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
क्या होगी कठोर कार्यवाही? जनता की मांग
यात्रियों और श्रद्धालुओं की ओर से यह मांग उठ रही है कि मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर इस गंभीर विषय पर तत्काल संज्ञान लें। कालाबाजारी, मिलावटखोरी और अवैध रूप से संचालित दुकानों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। खाद्य विभाग को अपनी 'कुंभकर्णी नींद' से जगाकर नियमित जांच अभियान चलाने के निर्देश दिए जाएं, ताकि कुंभ मेले की गरिमा और मध्य प्रदेश की छवि धूमिल न हो।
अब देखना यह होगा कि सरकार और प्रशासन इस पर क्या कदम उठाते हैं—क्या सख्त कार्यवाही होगी, या फिर श्रद्धालुओं को ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?


