भूमि पर माफियाओं की नजर, प्रशासन मौन! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं, अधिवक्ता बी.के. माला ने संभागायुक्त से लगाई न्याय की गुहार
विंध्य वसुंधरा समाचार | रीवा विशेष रिपोर्ट
रीवा नगर निगम क्षेत्र अंतर्गत ग्राम टेकुआ वार्ड क्रमांक 2 में शासन की पानी निकासी हेतु आरक्षित भूमि पर माफियाओं द्वारा अवैध कब्जा कर प्लाटिंग और विक्रय किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह भूमि मध्य प्रदेश शासन के जल निकासी नाले के नाम दर्ज है, जिसका सार्वजनिक उपयोगों एवं पर्यावरणीय संतुलन में विशेष महत्व है।
अधिवक्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता बी.के. माला ने इस अवैध गतिविधि के विरुद्ध पहले नगर निगम कमिश्नर तथा राजस्व विभाग के अधिकारियों को विधिवत शिकायती पत्र सौंपा था, जिसमें भूमि की अवैध बिक्री रोकने तथा नाला बहाली की मांग की गई थी। लेकिन अधिकारियों की चुप्पी और कार्रवाई से इनकार ने पूरे प्रशासनिक तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
वी के माला ने अब रीवा संभाग आयुक्त को औपचारिक आवेदन पत्र भेजकर मामले में संज्ञान लेने, वैधानिक प्लाटिंग पर तत्काल रोक लगाने एवं शासन की नाला भूमि को पुनः पूर्ववत बहाल किए जाने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने संबंधित भू-माफियाओं पर कड़ी कानूनी कार्यवाही की भी अपील की है।
सत्ता और संगठन की शह पर ज़मीन का खेल?
बी.के. माला ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पूरे मध्य प्रदेश में शासन की भूमि को कब्जा कर, अभिलेखों में हेराफेरी कर करोड़ों-अरबों की ज़मीनें बेची जा रही हैं। यह खेल केवल शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्राम पंचायत स्तर तक फैला हुआ है। रीवा जिले से लेकर मऊगंज तक, यह अवैध कारोबार एक सुनियोजित तंत्र के सहारे संचालित हो रहा है।
उन्होंने दावा किया कि इस गोरखधंधे में दो मुख्य ताकतें सक्रिय हैं – एक तरफ सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोग, और दूसरी तरफ स्वयं को देश के सबसे बड़े संगठन के नाम पर पदाधिकारी घोषित कर, नियम-कानून को ताक पर रखकर सरकार को अपने इशारों पर चला रहे लोग। प्रशासन की खामोशी और कार्रवाई से इनकार इस गठजोड़ की पुष्टि करते हैं।
प्राकृतिक संसाधनों पर खतरा, जनता की संपत्ति पर कब्जा
नाला भूमि की अवैध प्लॉटिंग न केवल शासन के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है, बल्कि यह पर्यावरण और जल संरक्षण के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है। वर्षा जल का बहाव बाधित होने से बाढ़, जलभराव और पारिस्थितिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। आम जन निस्तार की जमीनें पहले ही समाप्त हो रही हैं, ऐसे में प्रशासन की उदासीनता भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
क्या जागेगा प्रशासन या माफियाओं के आगे रहेगा नतमस्तक?
रीवा संभाग जैसे शांति प्रिय अंचल में यदि शासकीय भूमि की इस प्रकार खुली लूट होती रही और उस पर पर्दा डाला जाता रहा, तो आम जनता का विश्वास प्रशासनिक तंत्र से उठ जाएगा। अब देखना यह है कि संभाग आयुक्त इस गंभीर प्रकरण में क्या कार्रवाई करते हैं – क्या नाला भूमि पुनः शासन के नाम दर्ज की जाएगी, और क्या माफियाओं पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी कागज़ों में दफन होकर रह जाएगा?

